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________________ तीर्थंकर : एक अनुशीलन 122 टीका में भग शब्द के 14 अर्थ दिये हैं - सूर्य, ज्ञान, माहात्म्य, यश, वैराग्य, मुक्ति, रूप, वीर्य, प्रयत्न, इच्छा, श्री, धर्म, ऐश्वर्य, योनि। तीर्थंकर परमात्मा उपर्युक्त सभी परिभाषाओं पर खरे उतरते हैं। अत: वे भगवान कहलाने के सम्यक् अधिकारी हैं। तीर्थंकर परमात्मा अनंत ऐश्वर्य के धारक होते हैं, रूप-लावण्य के पोषक होते हैं। लक्ष्मी जिनके चरणकमल में निवास करती है। ऐसे यश के धारक होते हैं। वे धर्म एवं पुरुषार्थ की प्रतिमूर्ति, प्रचारक होते हैं। अतएव तीर्थंकर को भगवान कहा गया है। भगवान शब्द के कुछ पर्यायवाची नैरुक्त भी प्राप्त होते हैं। 1. भवान्त - भव (संसार) का अन्त करने वाले। 2. भयान्त - भय (त्रास) का नाश करने वाले। 3. भदन्त - भद (कल्याण) एवं सुख से युक्त। 4. भजन्त - सिद्धि के मार्ग की उपासना करने वाले। 5. भान्त/भ्राजन्त - ज्ञान से दीप्तियुक्त होने वाले। . 6. भग्नवान - कषायों को भग्न (क्षीण) करने वाले। इस प्रकार तीर्थंकर, भगवद्-विषयक अनेक विशेषणों से अभिहित किये गये हैं। सर्वश्रेष्ठ उपमाओं से उपमित तीर्थंकर तीर्थंकर को मुख्यतया चार लोकोत्तर विशिष्ट अर्थद्योतक उपमाओं से उपमित किया गया है। ऐसे विशेषणों से उपमित कर आगमकारों ने तीर्थंकर की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। इस सम्बन्ध में महोपाध्याय श्री यशोविजयजी म. ने कहा है - “महागोप महामाहण कहिये. निर्यामक सथ्थवाह । उपमा एहती जेहने छाजे ते जिन नमीए उत्साह रे भविका ! सिद्धचक्रपद वंदौ, जेम चिरकाल नंदो रे भविका ॥" वे चार उपमाएँ इस प्रकार हैं1. महागोप - गोप अर्थात् ग्वाला। विश्व में सर्वोत्तम ग्वाला अर्थात् 'महागोप'। उत्तम ग्वाला गौ आदि पशुओं को अरण्य में सुरक्षित रूप से चारा चराता है उन्हें मार्ग में चलाता है, हिंसक पशुओं से उनकी सर्वरूप सुरक्षा करता है एवं उनके स्थान तक पहुँचाता है। इसी जो जिनवचन में अनुरक्त हैं तथा जिनवचनों का भावपूर्वक आचरण करते हैं, वे निर्मल और असंक्लिष्ट होकर परीत संसारी हो जाते हैं, अल्प जन्म-मरणवाले हो जाते हैं। - उत्तराध्ययन (36/260)
SR No.002463
Book TitleTirthankar Ek Anushilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurnapragnashreeji, Himanshu Jain
PublisherPurnapragnashreeji, Himanshu Jain
Publication Year2016
Total Pages266
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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