SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 67
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अतीति- अये! समतामयि! हे करुणामयि! हे सुधामयि! हे विशुद्धचेतने! सर्वसम्बुद्धीनां स्पष्टोऽर्थः। अतिलघौ अतिशयेन लघुस्तस्मिन्, त्यक्तकरणविषये त्यक्ताः करणानामिन्द्रियाणां विषयाः स्पर्शादयो येन तस्मिन्, लघुधियि लघ्वी धीर्यस्य तस्मिन् अल्पबुद्धौ मयि कृपामनुकम्पां कुरु ।।१०।। अर्थ- हे समतामयि! हे करुणामयि! हे सुधामयि! हे विशुद्धचेतने! मुझ अल्पबुद्धि संयमी पर दया करो। मुझे विशुद्ध चेतनामय बनाओ ||१०० ।। [१०१] वै विषमयीमविद्यां विहाय 'ज्ञानसागरजां' विद्याम् । . सुधामेम्यात्मविद्यां नेच्छामि सुकृतजां भुवि द्याम् । आत्मवित् (अहम्) वै विषमयीम् अविद्यां विहाय ज्ञानसागरजां सुधां विद्याम् एमि। सुकृतजां यां द्यां भुवि न इच्छामि | वै इति- आत्मविद् आत्मानं वेत्ति जानातीति आत्मविद् आत्मज्ञोऽहं वै निश्चयेन विषमयीं गरलमयीं दुःखप्रदत्वात् अविद्यां विहाय त्यक्त्वा, 'ज्ञानसागरजां' ज्ञानमेवसागरस्तस्मिन् जातां ज्ञानपयोधिसमुत्पन्नां पक्षे 'ज्ञानसागर' इति स्वगुरोर्नाम तस्माज्जातां प्राप्तां सुधां पीयूषरूपां आत्मविद्यां एमि प्राप्नोमि। सुकृतजां पुण्योद्भूतां यां द्यां स्वर्ग भुवि नेच्छामि न कामये।।१०१।। ___अर्थ- मैं आत्मज्ञ, निश्चय से विषमयी अविद्या को छोड़कर ज्ञानरूप सागर में उत्पन्न (गुरु ज्ञानसागरजी से प्राप्त) आत्मविद्या को प्राप्त होता हूँ। पुण्य से प्राप्त होने वाला जो द्यौ – स्वर्ग है, उसे नहीं चाहता हूँ ।।१०१।। विभावतः सुदूराणां, सन्ततिर्जयतात् तराम् । द्यामेत्य पुनरागत्य, स्वानुभूतेः शिवं व्रजेत् ।।१।। अर्थ- विभावभावों से अत्यन्त दूर रहने वाले साधुओं की वह सन्तति-परम्परा जयवन्त रहे; जो स्वर्ग जाकर तथा वहाँ से आकर स्वानुभूति से मोक्ष प्राप्त कर सके।।१।। साधुता सा पदं ह्येतु, भूपतौ च जने-जने । गवि सर्वत्र शान्तिः स्यात् , मदीया भावना सदा।।२।। अर्थ- वह साधुता-सज्जनता राजाओं तथा प्रत्येक मनुष्य में स्थान को प्राप्त हो, जिससे पृथिवी में सर्वत्र शान्ति रहे, यह मेरी भावना है।।२।। . (५०)
SR No.002457
Book TitlePanchshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyasagar, Pannalal Sahityacharya
PublisherGyanganga
Publication Year1991
Total Pages370
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy