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________________ नमिऊणस्तोत्रम् ||... माना कि मुद्गरौ यस्य तम् दीर्घकरोल्लोलवर्धितोत्साहम् दीर्घः आयतः करः शुण्डादण्डः तस्य उल्लोलः चालनं तेन वर्धितः वृद्धिंगतः उत्साह उल्लासः यस्य तम् मधुपिंगनयनयुगलम् मधु माझिकं इव पिंगं पीतं नयनयोः नेत्रयोः युगलं युग्मं यस्य तम् ससलिलनवजलधरारावर सलिलेन जलेन सहितः सचासौ नवजलधरः नूतनमेघः- तस्य आरावः शब्दः इव आरावो यस्य सः तमू भीमं भीषणं महागजेन्द्रं अर्जितकुंजरं अत्यासन्नमपि अतिसमीपस्थंअपि न विगणयन्ति न कलयन्ति ॥ १४-१५ ॥ (पदार्थ) ( मुणिवइ ) हे मुनिपते (जे ) जो मनुष्य (तुम्ह) आपके ( तुंगं ) गुणोंसे उन्नत ( चलणजुअलं ) चरण युगलका ( समल्लीणा ) सम्यक् आश्रय करलेतेहैं (ते) वे मनुष्य ( ससि ) चंद्रके समान (धवल ) श्वेत ( दंतमुसलं ) दंतद्वयरूप मुसलहै जिसको, ( दीह) लंबे (कर) शुंडादण्ड के ( उल्लाल.) संचालनसे. ( वढि ) बढ़गया है ( उच्छाह ) उत्साह जिसका. ( महु ) शहदके समान (पिंग) पीली हैं (नयनजुअलं) दोनों आँखें जिसकी ( ससालल ) जलसहित ( नव)
SR No.002456
Book TitleStotradi Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKantimuni, Shreedhar Shastri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages214
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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