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________________ जैनेत्तर विद्वानोंकी सम्मतिए. (६१) एव वह ईश्वर का अस्तित्व नहीं मानते ऐसा नहीं है। किन्तु ईश्वर की कृति सम्बन्धि विषय में उनकी ओर हमारी समझ में कुछ भेद है । इस कारण जैनी नास्तिक हैं ऐसा निर्बल व्यर्थ अपवाद उन विचारों पर लगाया गया है। अतः यदि उन्हें नास्तिक कहोगे तो. न कर्तृत्व न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्म फल संयोगं स्वाभावस्तु प्रवर्तते ॥ नादत्ते कस्य चित्पापन कस्य सुकृत्यं विभुः । अज्ञानो नावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ * . ऐसा कहनेवाले श्री कृष्णजी की भी नास्तिकों में गणना करना पड़ेगी। . आस्तिक व नास्तिक यह शब्द ईश्वर के अस्तित्व संबन्ध में व कर्तृत्व सम्बन्ध में न जोड़ कर पाणीनीय ऋषि के सूत्रानुसारः परलोकोऽस्तीति मतिर्यस्यास्तीति आस्तिकः । . परलोको नास्तीति मतिर्यस्यास्तीति नास्तिकः ।। *देखो श्रीनगवद्गीता अध्याय २ श्लोक १४, १५ इस का मर्य:-परमेश्वर बगत का कर्तृत्व व कर्म को उत्पन्न नहीं करता, इसी प्रकार कर्मों के फलकी योजना भी नहीं करता, स्वभाव से सब होता है । प मेश्वर किसी का पाप नही लेता और न पुण्य लेता है। प्रज्ञान के द्वारा ज्ञान पर पर्दा पर जाने से प्राणी मात्र मोह मे फस चाते है।
SR No.002448
Book TitleJain Jati mahoday
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherChandraprabh Jain Shwetambar Mandir
Publication Year1995
Total Pages1026
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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