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________________ आरुप्पनिद्देसो २०१ नानत्ता नानासभावा अञ्जमलं असदिसा, तस्मा नानत्तसञा ति वुत्ता। तासं सब्बसो नानत्तसञानं अमनसिकारा अनावज्जना असमन्नाहारा अपच्चवेक्खणा। यस्मा ता नावजेति, न मनसि करोति, न पच्चवेक्खति, तस्मा ति वुत्तं होति। यस्मा चेत्थ पुरिमा रूपसझा पटिघसा च इमिना झानेन निब्बत्ते भवे पि न विजन्ति, पगेव तस्मि भवे इमं झानं उपसम्पज विहरणकाले, तस्मा तासं समतिक्कमा अत्थङ्गमा ति द्वेधा पि अभावो येव वुत्तो। नानत्तसज्ञासु पन यस्मा अट्ठ कामावचरकुसलसञ्जा, नव किरियसञ्जा, दसाकुसलसञ्जा–ति इमा सत्तवीसतिसञा इमिना झानेन निब्बत्ते भवे विज्जन्ति, तस्मा तासं अमनसिकारा ति वुत्तं ति वेदितब्बं । तत्रा पि हि इमं झानं उपसम्पज विहरन्तो तासं अमनसिकारा येव उपसम्पज्ज विहरति, ता पन मनसिकरोन्तो असमापनो होती ति। १३. सङ्केपतो चेत्थ "रूपसानं समतिक्कमा'' ति इमिना सब्बरूपावचरधम्मानं पहानं वुत्तं। "पटिघसञानं अत्थङ्गमा, नानत्तसञानं अमनसिकारा" ति इमिना सब्बेसं कामावचरचित्तचेतसिकानं पहानं च अमनसिकारो च वुत्तो ति वेदितब्बो। १४. अनन्तो आकासो ति। एत्थ नास्स उप्पादन्तो वा वयन्तो वा पञ्जायती ति अनन्तो। आकासो ति कसिणुग्घाटिमाकासो' वुच्चति। मनसिकारवसेना पि चेत्थ अनन्तता वेदितब्बा। तेमेव विभङ्गे वुत्तं-"तस्मि आकासे चित्तं ठपेति, सण्ठपेति, अनन्तं फरति, तेन वुच्चति अनन्तो आकासो' (अभि० २/३१५) ति। नानात्व-संज्ञाओं का सर्वथा मनस्कार न करने, ध्यान न देने, (उनके प्रति) एकाग्र न होने, प्रत्यवेक्षण न करने से। अर्थात् क्योंकि उनके प्रति ध्यान नहीं देता, मन में नहीं लाता, प्रत्यवेक्षण नहीं करता, इसलिये। एवं क्योंकि यहाँ पहले की रूपसंज्ञा एवं प्रतिघसंज्ञा इस ध्यान द्वारा उत्पन्न भव में भी नहीं रहती, उस भव में इस ध्यान को प्राप्त कर विहार करने के समय के बारे में तो कहना ही क्या है! अत: उनका अतिक्रमण करने एवं अस्त होने से–यों दो प्रकार से (उनका) अभाव ही बतलाया गया है। नानात्वसंज्ञाओं में आठ कामावचर कुशलसंज्ञा, नौ क्रियासंज्ञा, दस अकुशलसंज्ञाये सत्ताईस (२७) संज्ञाएँ क्योंकि इस ध्यान द्वारा उत्पन्न भव में होती हैं; इसलिये उनका मनस्कार न करना कहा गया है-यह जानना चाहिये। वहाँ भी इस ध्यान को प्राप्त कर विहार करने वाला (योगी) उनका मनस्कार न करते हुए ही (ध्यान को) प्राप्त कर साधना करता है। यदि उनका मनस्कार करता है तो (ध्यान-) लाभी नहीं होता। १३. संक्षेप में यहाँ “रूपसंज्ञाओं के समतिक्रमण से"-इस (कथन) द्वारा सब रूपावचर धर्मों का प्रहाण बतलाया गया है। तथा "प्रतिघसंज्ञाओं के अस्त होने से, नानात्वसंज्ञाओं के अमनस्कार से"-इसके द्वारा सब कामावचर चित्त-चैतसिकों का प्रहाण और अमनस्कार बतलाया गया है-यह जानना चाहिये। १. अजटाकास-परिच्छिन्नाकासानं इध अनधिपेतत्ता "आकासो ति कसिणुग्घाटिमाकासो वुच्चती" ति आह। कसिणं उग्घाटियति एतेना ति कसिणुग्घाटो, तदेव कसिणुग्घाटिमं।
SR No.002429
Book TitleVisuddhimaggo Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDwarikadas Shastri, Tapasya Upadhyay
PublisherBauddh Bharti
Publication Year2002
Total Pages386
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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