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________________ भिक्षाचर्या स्वरूप - उत्पादन दोष योगशास्त्र प्रथम प्रकाश श्लोक ३८ ८. क्रीत - साधुओं के लिए मूल्य से खरीदकर वस्तुएँ लाकर उन्हें दे दे, वहाँ क्रीतदोष होता है। ९. प्रामित्यक - साधुओं को देने के लिए उधार लाकर आहार देना प्रामित्यक दोष है। १०. परिवर्तित - अपनी एक वस्तु को किसी दूसरे की वस्तु के साथ अदला-बदली करके साधुओं को देने पर परिवर्तित दोष होता है। ११. अभ्याहृत - साधुओं को तकलीफ न हो, इस दृष्टि से अथवा भक्ति की भावना से दूसरे गांव से आहार आदि | सामने लाकर देना अभ्याहृत दोष है। १२. उभिन्न - घी, तेल आदि के बर्तनों पर लगे हुए मिट्टी आदि के लेप या आच्छादन आदि साधुओं के निमित्त दर करके या उतारकर उनमें से साधओं को देना. उदभिन्न दोष है। १३. मालापहृत - निश्रेणी आदि रखकर उस पर चढ़कर या नीचे तलघर आदि में उतरकर आहार आदि वस्तु देना; बहुत ऊपर से अथवा बहुत नीचे भोंयरे आदि से अथवा छींका आदि से उतारकर साधु को आहार देना मालापहृत दोष है। १४. आच्छेद्य - सेठ, राजा या चोर आदि से या अन्य किसी से उनकी वस्तु को छीनकर साधुओं को दें, उसे लेने से आच्छेद्य दोष लगता है। १५. अनिःसुष्ट - भोजन आदि कोई भी बहुत-से मनुष्यों की अथवा समूह की हो। उन सब मनुष्यों की या समूह की अनुमति लिये बिना कोई एक व्यक्ति अपनी मर्जी से ही साधुओं को भोजन आदि देता है तो वहाँ अनिःसृष्ट दोष लगता है। १६. अध्यवपूरक- अपने लिये खेत में धान बोया हो परंतु साधु-महाराज का गांव में आगमन सुनकर उनके लिए भी धान आदि बोये, वहां अध्यवपूरक दोष लगता है। अथवा अपने लिये थोड़ा-सा पकाया हो, लेकिन साधुओं को देखकर हांडी आदि बर्तन में और अधिक डाला गया हो, वहाँ भी यह दोष है। इस प्रकार प्रथम उद्गम-दोष का विवेचन पूर्ण हुआ। (ब) उत्पादन-दोष :- ये सोलह प्रकार के दोष साधुओं से लगते हैं। वे निम्नलिखित है १. धात्रीपिंड, २. दूतिपिंड, ३. निमित्तपिंड, ४. आजीवपिंड, ५. वनीपकपिंड, ६. चिकित्सा पिंड, ७. क्रोधपिंड, ८. मानपिंड, ९. मायापिंड, १०. लोभपिंड, ११. पूर्वपश्चात् संस्तवपिंड, १२. विद्यापिंड, १३. मंत्रपिंड, १४. चूर्णपिंड, १५. योगपिंड और १६. मुलकर्मपिंड। (४०८-४०९ पिण्डनि.) इनका वर्णन निम्न प्रकार से हैं१. धात्रीपिंड - साधु या साध्वी भिक्षा प्राप्त करने के लिए गृहस्थी के बालबच्चों को दूध पिलाकर, स्नान करवाकर, वस्त्र या आभूषण पहनाकर, लाड-प्यार करके या उनको खिलाकर तथा गोद में बिठाकर, ये और इस प्रकार के अन्य धात्रीकर्म (धायमाता की तरह का काम) करके भिक्षा प्राप्त करें तो वहाँ धात्रीपिंड दोष लगता है। २. दूतिपिंड - दूती की तरह एक दूसरे के संदेश पहुंचाकर आहार ले तो वहां दूतिपिंड दोष लगता है। ३. निमित्तपिंड - भूत, भविष्य और वर्तमानकाल के व्यापार-संबंधी या अन्य सांसारिक लाभ-हानि बताकर निमित्त कथन करके भिक्षा ग्रहण करे वहां निमित्त पिंड दोष लगता है। ४. आजीवपिंड - अपनी जाति, कुल, गण, कर्म, व्यापार, शिल्प, कला आदि की बड़ाई करके आहार लेना या गहस्थ के यहां नौकर की तरह कोई काम करके भिक्षा लेना आजीवपिंड दोष है। ५. वनीपकपिंड - श्रमण, ब्राह्मण, क्षपण, अतिथि, श्वान आदि के भक्तों के सामने अपने को भी उनका भक्त बताकर आहार के लिए स्वयं दर्शन दे और आहार ले वहाँ वनीपक-पिंड दोष होता है। ६. चिकित्सापिंड- वैद्य बनकर वमन, विरेचन आदि रोग की औषधि बताकर आहार ले, वहां चिकित्सापिंड दोष लगता है। 56
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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