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________________ अनुभवित योग का वर्णन - उपसंहार योगशास्त्र द्वादशम प्रकाश श्लोक ५३ से ५५ अर्थ :- इस उन्मनीभाव के फल के सामने मधु मधुर नहीं लगता, चंद्रमा की कांति भी शीतल नहीं प्रतीत होती, अमृत केवल नाममात्र का अमृत रह जाता है और सुधा का फल भी निष्फल ही हो जाता है। इसलिए हे मनमित्र! तूं परिणाम में दुःख देने वाले प्रयास को बस कर। अब तूं मुझ पर प्रसन्न हो, क्योंकि अखंड परमानंद-फल की प्राप्ति तेरे प्रसन्न होने पर ही निर्भर है ॥५२॥ स्वानुभव से उन्मनीभाव-संबंधी उपदेश देने वाले गुरु की स्तुति व्यतिरेकभाव से बताते हैं।१००६। सत्येतस्मिन्नरति-रतिदं गुह्यते वस्तु दूरादप्यासन्नऽप्यसति तु मनस्याप्यते नव किञ्चित् ।। पुंसामित्यप्यवगतवतामुन्मनीभावहेताविच्छा बाढं न भवति कथं सद्गुरुपासनायाम् ॥५३॥ अर्थ :- जब तक मन की स्थिति विद्यमान है, तब तक अरति के कारण रूप व्याघ्र आदि और रति के कारण रूप स्त्री आदि वस्तुएं दूर होने पर भी मन के द्वारा दुःख-सुख ग्रहण किये जाते हैं और मन विद्यमान न हो, अर्थात् उन्मनीभाव हो जाने पर अरति या रति देने वाली वस्तु पास में हो, तो भी वह दुःखसुख ग्रहण नहीं करता। सुख-दुःख तो मनसंबंधी वृत्तियों पर आधारित है; विषयों की प्राप्ति से या विषय-भोग-से उत्पन्न होने वाले नहीं। अतः इस तत्त्व के ज्ञाता पुरुषों का उन्मनीभाव के कारणभूत सद्गुरु की उपासना करने की प्रबल अभिलाषा क्यों नहीं होगी? अवश्यमेव होगी ॥५३॥ अब अमनस्कता की उपायभूत आत्म-प्रसन्नता के लिए बताते है-- ।१००७। तांस्तानापरमेश्वरादपि परान् भावैः प्रसादं नयन्, तैस्तैस्तत्तदुपायमूढ! भगवन्नात्मन्! किमायास्यसि?। हन्तात्मनमपि प्रसादय मनाग् येनासतां सम्पदः, साम्राज्यं परमेऽपि तजसि तव प्राज्यं समुज्जृम्भते।।५४॥ अर्थ :- परमानंद प्राप्त करने के यथार्थ उपायों से अनभिज्ञ मूढ़! भगवन् आत्मन्! तूं इस परमात्मा को प्राप्त कर। अपरमेश्वर-रूप दूसरे किसी भी देव के पास जाकर इष्ट पदार्थ भेंट देकर, मनौती करके उनकी सेवापूजा-भक्ति आदि उपायों से धन, यश, विधा, राज्य, स्वर्ग आदि इष्ट पदार्थों की प्रार्थना करके रोग, दरिद्रता, तुच्छ उपद्रव आदि अनर्थों से छुटकारा पाने की चाह से प्रेरित होकर अरे आत्मभगवन्! अपने आपको क्यों परेशान करते हो? अफसोस है, अपने आत्मदेव को भी तो जरा प्रसन्न कर, जिससे असत् पदार्थों की संपदाएँ छूटकर केवलज्ञान रूप परमतेज के प्रकाश में तेरा विशाल साम्राज्य प्रकट हो ॥५४॥ व्याख्या :- यहाँ 'आत्मभगवन्! भविष्य में पूज्य होने के कारण से कहा गया है। अभी तक तो दूसरे उपायों से अथवा दूसरे तथाकथित देवों को परमेश्वर मानकर उन्हें खुश करता रहा। इसमें तूं मूढ़ बनकर ठगा गया है। इसलिए रजोगुण और तमोगुण दूर कर, अर्थात् इस लोक या परलोक की सांसारिक सुखाभिलाषा दूर करके शाश्वत सुख के स्वामी आत्मन्! तूं अपने आत्मदेव को ही जरा प्रसन्न कर; इससे दूसरी लौकिक संपत्ति अथवा अनर्थ-परिहार रूप समृद्धि तो मिलने वाली ही है; परंतु परम-ज्योति (ज्ञान) स्वरूप केवलज्ञान के विशाल साम्राज्य का स्वामित्व तुझ में प्रकट होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि 'सारे जगत् को प्रसन्न करने का प्रयास छोड़कर केवल एक अपनी आत्मा को प्रसन्न कर, जिससे परमेश्वरत्व की संपदाएँ और ऐश्वर्य आसानी से प्राप्त होता है। उसके बिना सब प्रयत्न व्यर्थ समझना। इस प्रकार के साम्राज्य में उन्मनीभाव सुलभ बनता है ।।५४।। हमने पहले 'सिद्धांत रूप समुद्र से सद्गुरु-परंपरा से और स्वानुभव से जानकर, इत्यादि कथन किया था, उसे |निभाकर यानी योगशास्त्र ग्रंथ की रचना पूर्ण कर दी। अब उसका उपसंहार करते हैं ।१००८। या शास्त्रात् सुगुरोमुखादनुभवाच्चाज्ञायि किञ्चित् क्वचित् । योगस्योपनिषद्-विवेकिपरिषच्चेतश्चमत्कारिणी । श्रीचौलुक्य-कुमारपाल-नृपतेरत्यर्थमभ्यर्थनाद् । आचार्येण निवेशिता पथि गिरां श्रीहेमचन्द्रेण सा ॥५५।। 461
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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