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________________ योगशास्त्र द्वादशम प्रकाश श्लोक ३६ से ४२ मन की मदद के बिना अपने-अपने विषय में प्रवृत्त नहीं होती। जब आत्मा मन को प्रेरित नहीं करता और मन इंद्रियों को प्रेरित नहीं करता; तब दोनों तरफ से भ्रष्ट बना हुआ मन अपने आप ही विनष्ट हो जाता है ।।३३-३५ ।। अनुभवित योग का वर्णन मनोविजय का फल कहते हैं अर्थ । ९८९ । नष्टे मनसि समन्तात्, सकले विलयं च सर्वतो याते । निष्कलमुदेति तत्त्वं, निर्वातस्थायिदीप इव ॥ ३६ ॥ :- इस प्रकार मन का कार्य-कारणभाव या प्रेरक-प्रेर्यभाव चारों ओर से नष्ट होने पर, अर्थात् राख से ढकी हुई अग्नि के समान शांत हो जाने पर और चिंता, स्मृति आदि उसके सभी व्यापार जलप्रवाह में बहते हुए अग्रिक के समान विलय (क्षय) हो जाने पर वायु-रहित स्थान में रखे हुए दीपक के समान आत्मा में कर्ममल से रहित निष्कलंक तत्त्वज्ञान प्रकट होता है ।। ३६ ।। तत्त्वज्ञान होने की पहचान बताते हैं - । ९९० । अङ्गमृदुत्व - निदानं, स्वेदन - मर्दन - विवर्जनेनापि । स्निग्धीकरणमतैलं, प्रकाशमानं हि तत्त्वमिदम् ||३७|| अर्थ :- पहले कहे अनुसार जब तत्त्वज्ञान प्रकट हो जाता है, तब पसीना न होने पर और अंग-मर्दन न करने पर भी शरीर कोमल हो जाता है, तेल की मालिश के बिना ही शरीर चिकना हो जाता है, यह तत्त्वज्ञान प्रकट होने की निशानी है ||३७|| दूसरा लक्षण बताते हैं । ९९१ | अमनस्कतया सञ्जायमानया नाशिते मनःशल्ये । शिथिलीभवति शरीरं, छत्रमिव स्तब्धतां त्यक्त्वा ॥ ३८ ॥ अर्थ :- मन का शल्य नष्ट हो जाने से, मनोरहित उन्मनीभाव उत्पन्न होने पर तत्त्वज्ञानी का शरीर छाते के समान स्तब्धता ( अकड़ाई) छोड़कर शिथिल हो जाता ||३८|| | । ९९२ । शल्यीभूतस्यान्तःकरणस्य क्लेशदायिनः सततम् । अमनस्कतां विनाऽन्यद्, विशल्यकरणौषधं नास्ति ॥ ३९ ॥ अर्थ :- निरंतर क्लेश देने वाले शल्यीभूत (कांटे की तरह बने हुए) अंतकरण को निःशल्य करने वाली औषध अमनस्कता (उन्मनीभाव ) के सिवाय और कोई नहीं है ||३९|| उन्मनीभाव का फल कहते हैं | । ९९३ । कदलीवच्चाविद्या, लोलेन्द्रियपत्रला मनः कन्दा । अमनस्कफले दृष्टे, नश्यति सर्वप्रकारेण ॥४०॥ अर्थ :- अविद्या केले के पौधे के समान है, चंचल इंद्रियाँ उसके पत्ते हैं, मन रूपी उसका कंद है। जैसे उसमें फल दिखायी देने पर केले के पेड़ को नष्ट कर दिया जाता है, क्योंकि उसमें पुनः फल नहीं आते, उसी प्रकार उन्मनीभाव रूपी फल दिखाई देने पर अविद्या भी पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है, इसके बाद दूसरे कर्म लगते नहीं हैं ||४० ॥ मन को जीतने में अमनस्कता ही मुख्य कारण है; उसे कहते हैं | । ९९४ ॥ अतिचञ्चलमतिसूक्ष्मं, दुर्लक्ष्यं वेगवत्तया चेतः । अश्रान्तमप्रमादाद्, अमनस्कशलाकया भिन्द्यात् ॥४१॥ अर्थ :- मन अतिचंचल, अतिसूक्ष्म और तीव्र वेगवाला होने के कारण उसे रोककर रखना अतिकठिन है, अतःमन को विश्राम दिये बिना प्रमादरहित होकर अनमस्कता रूपी शलाका से उसका भेदन करना चाहिए ||४१|| मन को मारने के लिए अमनस्कता ही शलाका रूप शस्त्र है। अमनस्कता के उदय होने पर योगियों को क्या फल | मिलता है, इसे बतलाते हैं | । ९९५ । विश्लिष्टमिव प्लुष्टमिवोड्डीनमिव प्रलीनमिव कायम् । अमनस्कोदय - समये, योगी जानात्यसत्कल्पम्॥४२॥ अर्थ :- अमनस्कता उदय हो जाने के समय योगी यह अनुभव करने लगता है कि मेरा शरीर पारे के समान 459
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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