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________________ शुक्लध्यान का स्वरूप योगशास्त्र एकादशम प्रकाश श्लोक ५६ से ६१ सूक्ष्मकाययोग से रहित सूक्ष्मक्रियानिवर्ति नाम का ध्यान करते हैं, इसी का दूसरा नाम 'समुच्छिन्नक्रिय' | है ।।५३-५५।। ।९४८। तदनन्तरं समुत्सन्नक्रियमाविर्भवेदयोगस्य। अस्यान्ते क्षीयन्ते त्वघातिकर्माणि चत्वारि ॥५६॥ अर्थ :- उसके बाद अयोगी केवली बनकर वे समुछिन्नक्रिया नामक चौथा शुक्लध्यान प्रकट करते हैं। इससे | समस्त क्रियाएँ बंद हो जाती हैं। इसके अंत में चार अघातिकर्मों का क्षय हो जाता है ।।६।। |९४९। लघुवर्णपञ्चकोगिरणतुल्यकालमवाप्य शैलेशीम् । क्षपयति युगपत् परितो, वेद्यायुर्नामगोत्राणि ॥५७।। अर्थ :- तदनंतर 'अ, इ, उ, ऋ, लु' इन पांच ह्रस्व-स्वरों को बोलने में जितना समय लगता है, उतने समय तक में शैलेशी अवस्था अर्थात् मेरुपर्वत के समान निश्चल दशा प्राप्त करके एक साथ वे वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र कर्म को मूल से क्षय कर देते हैं ।।५७।। उसके बाद।९५०। औदारिक-तैजस-कार्मणानि संसारमूलकारणानि। हित्वेह ऋजुश्रेण्या समयेनैकेन याति लोकान्तम्।।५८।। अर्थ :- संसार के मूलकारणभूत औदारिक, तैजस, और कार्मण रूप शरीरों का त्याग करके विग्रह-रहित - ऋजुश्रेणी से दूसरे आकाशप्रदेश को स्पर्श किये बिना एक समय में (दूसरे समय का स्पर्श किये बिना) लोक के अंतभाग में सिद्धक्षेत्र में साकार-उपयोगसहित आत्मा पहुंच जाती है ।।५८।। कहा भी है-'इस पृथ्वीतल पर अंतिम शरीर का त्याग करके वहाँ जाकर आत्मा सिद्धि प्राप्त करता है।' यहां प्रश्न होता है कि. 'जीव ऊपर जाते समय लोकांत से आगे क्यों नहीं जाता? अथवा शरीर का त्यागकर धरती के नीचे या तिरछा क्यों नहीं जाता है? इसका उत्तर देते हैं।।९५१।नोर्ध्वमुपग्रहविरहादधोऽपि वा नैव गौरवाभावात् । योग-प्रयोग-विगमात् न तिर्यगपि तस्य गतिरस्ति।।५९।। अर्थ :- सिद्धात्मा लोक से ऊपर अलोकाकाश में नहीं जाता, क्योंकि जैसे मछली की गति में सहायक जल है, वैसे ही जीव की गति में सहायक धर्मास्तिकाय द्रव्य है, वह लोकांत के ऊपर नहीं होने से जीव आगे नहीं जा सकता; तथा वह आत्मा नीचे भी नहीं जाती; क्योंकि उसमें गुरुता नहीं है और कायादि योग और उसकी प्रेरणा, इन दोनों का अभाव होने से तिरछा भी नहीं जाता है ॥५९॥ . यहाँ कर्म से मुक्त होने पर आत्मा को ऊपर जाने के लिए प्रदेश तो मर्यादित है, इसलिए उसकी गति नहीं होनी चाहिए? इस प्रश्न का समाधान इस प्रकार करते हैं||९५२। लाघवयोगाद् धूमवदलाबुफलवच्च सङ्गविरहेण । बन्धनविरहादेरण्डवच्च सिद्धस्य गतिरूर्ध्वम्॥६०।। अर्थ :- सिद्ध परमात्मा के जीव (आत्मा) की लघुताधर्म के कारण धुंए के समान ऊर्ध्वगति होती है तथा संग रहित होने से तथाविध परिणाम से ऊपर ही जाता है। जैसे तुंबे पर संयोग रूप मिट्टी के आठ लेप किये हों तो उसके वजनदार हो जाने से मिट्टी के संग से वह जल में डूब जाता है, परंतु पानी के संयोग से क्रमशः लेप दूर हो जाता है, तब वह तुंबा हलका हो जाने पर पानी के ऊपर स्वाभाविक रूप से अपने आप आ जाता है; उसी प्रकार कर्मलेप से मुक्त जीव भी अपने आप लोकांत तक पहुंच जाता है। कोश से मुक्त एरंड का बीज ऊपर की ओर जाता है, वैसे ही कर्मबंध से मुक्त सिद्ध की ऊर्ध्वगति होती है।।६।। ।९५३।सादिकमनन्तमनुपमम्, अव्याबाधं स्वभावजं सौख्यम् । प्राप्य सकेवलज्ञानदर्शनो मोदते मुक्तः ।।६१।। अर्थ :- केवलज्ञान और केवलदर्शन से युक्त सिद्धात्मा सर्वकर्मो से मुक्त होकर सादि-अनंत अनुपम, अव्याबाध __ और स्वाभाविक पैदा होने वाले आत्मिक सुख को प्राप्त कर उसी में मग्न रहते हैं ।।१।। व्याख्या :- आदि-सहित हो वह सादिक कहलाता है। संसार में पहले कभी भी ऐसे सुख का अनुभव नही किया, 453
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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