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________________ || ॐ अर्हते नमः ।। ११. एकादशम प्रकाश ____ अब धर्मध्यान का उपसंहार करके शुक्लध्यान का स्वरूप बताते हैं। ।८९३। स्वर्गापवर्गहेतुर्धर्मध्यानमिति कीर्तितं तावत् । अपवर्गकनिदानं, शुक्लमतः कीर्त्यते ध्यानम् ॥१॥ अर्थ :- स्वर्ग के कारणभूत और परंपरा से मोक्ष के कारणभूत धर्मध्यान का वर्णन कर चुके। अब मोक्ष के एकमात्र कारणभूत शुक्लध्यान के स्वरूप का वर्णन करते हैं ॥१॥ व्याख्या :- शुक्लध्यान के चार भेद हैं। शुक्लध्यान के अंतिम दो भेदों की अपेक्षा से यह मोक्ष का असाधारण कारण है और प्रथम दो भेदों की अपेक्षा से यह अनुत्तर विमान में ले जाने का कारणभूत है। कहा है कि 'शुभ आस्त्रव, संवर, निर्जरा, विपुल देवसुख आदि को उत्तम धर्मध्यान का शुभानुबंधी फल समझना चाहिए। शुक्लध्यान के प्रथम दो भेदों का फल अपूर्व तेज-कांति, अपूर्व सुखानुभव, तथा अनुत्तरदेवत्व का सुख भोगना है, और अंतिम दो भेदों का फल निर्वाण-मोक्ष होता है' ।।१।। अब शुक्लध्यान के अधिकारी का निरूपण करते हैं1८९४। इदमादिमसंहनना एवालं पूर्ववेदिनः कर्तुम्। स्थिरतां न याति चित्तं कथमपि यत्स्वल्प-सत्त्वानाम् ।।२।। अर्थ :- वज्रऋषभनाराच (प्रथम) संहनन वाले और पूर्वश्रुतधारी मुनि ही शुक्लध्यान करने में समर्थ हो सकते __ हैं। इनसे रहित अल्पसत्त्व वाले साधक के चित्त में किसी भी तरह शुक्लध्यान की स्थिरता प्राप्त नहीं होती ।।२।। ___ व्याख्या :- पहले रचित होने से पूर्व कहलाता है, उसको धारण करने वाले या जानने वाले पूर्ववेदी कहलाते हैं। यह वचन प्रायिक समझना, क्योंकि माषतुष, मरुदेवी आदि पूर्वधर न होने पर भी, उनके ध्यान को शुक्लध्यान माना है, संघयण आदि से ध्यान में चिरस्थिरता रह सकती है, इसलिए इसे मुख्यहेतु कहा है ।।२।। इसी बात का विचार करके कहते है।८९५। धत्ते न खलु स्वास्थ्य, व्याकुलितं तनुमतां मनो विषयैः । शुक्लध्याने तस्माद्, नास्त्यधिकारोऽल्पसाराणाम्।।३।। अर्थ :- इन्द्रिय-विषयों से आकुल-व्याकुल बने हुए शरीरधारियों का मन स्वस्थ; शांत एवं स्थिर नहीं हो सकता। इसी कारण अल्पसत्त्व वाले जीव शुक्लध्यान के अधिकारी नहीं हो सकते ।।३।। __ व्याख्या :- कहते हैं, शुक्लध्यानी साधक के शरीर को कोई किसी शस्त्र से छेदन-भेदन करे, मारे, जला दे; फिर | भी वह दूर खड़े हुए प्रेक्षक की तरह देखा करता है, तथा वर्षा, वायु, ठंड, गर्मी आदि दुःखों से वह अधीर नहीं होता, शुक्लध्यान में जब आत्मा तन्मय बन जाता है, तब आँखों से कुछ भी नहीं देखता है, कानों से कुछ भी सुनता नहीं है; तथा पाषाण की मूर्ति के समान इन्द्रिय-संबंधी कोई भी ज्ञान वह नहीं करता। इस प्रकार जो अपने ध्यान में स्थिरता रखता है, वही शुक्लध्यान का अधिकारी हो सकता है; अल्पसत्त्व वाला नहीं हो सकता। यहाँ शंका करते हैं कि प्रथम |संहनन वाले ही शुक्लध्यान के अधिकारी हो सकते हैं, ऐसा कहा है, तो इस दुःषमकाल में तो अंतिम सेवार्त-संहनन वाले पुरुष हैं; ऐसी स्थिति में शुक्लध्यान के उपदेश देने की इस समय क्या आवश्यकता है? ।।३।। - इस प्रश्न का यहाँ समाधान करते हैं।८९६। अनवच्छित्त्याम्नायः समागतोऽस्येति कीर्त्यतेऽस्माभिः । दुष्करमप्याधुनिकैः शुक्लध्यानं यथाशास्त्रम्॥४॥ अर्थ :- यद्यपि शास्त्रानुसार वर्तमानकाल के साधकों के लिए शुक्लध्यान करना अतिदुष्कर है, फिर भी शुक्लध्यान के संबंध में अनवच्छिन्न आम्नाय-(परंपरा) चली आ रही है, वह टूट न जाय, इसलिए उसका स्वरूप बता रहे हैं ॥४॥ 445
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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