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________________ योगशास्त्र अष्टम प्रकाश श्लोक ६६ से ७५ 'ॐ नमो उवज्झायाणं हैं स्वाहा' अनामिका में, 'ॐ नमो लोए सव्वसाहूणं ह्री स्वाहा' कनिष्ठा अंगुलि में स्थापना करके यंत्र के मध्य में बिन्दुसहित ॐ कार की स्थापना करे। इस तरह तीन बार अंगुलियों में विन्यास करके यंत्र को मस्तक पर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तरदिशा के अंतर- भाग में स्थापित करके जाप - चिंतन करे ।।६४-६५ ।। तथा पदस्थ ध्यान का स्वरूप ।८३७। अष्टपत्रेऽम्बुजे ध्यायेद्, आत्मानं दीप्ततेजसम् । प्रणवाद्यस्य मन्त्रस्य, वर्णान् पत्रेषु च क्रमात् ॥६६|| ।८३८ । पूर्वाशाभिमुखः पूर्वम् अधिकृत्याऽऽदिमण्डलम् । एकादशशतान्यष्टाक्षरं मन्त्रं जपेत् ततः ॥६७॥ । ८३९ । पूर्वाशाऽनुक्रमादेवम् उद्दिश्यानयदलान्यपि । अष्टरात्रं जपेद् योगी, सर्वप्रत्यूहशान्तये ॥६८॥ १८४०। अष्टरात्रे व्यतिक्रान्ते, कमलस्यास्य वर्तिनः । निरूपयति पत्रेषु वर्णानेताननुक्रमम् ॥६९॥ । ८४१ । भीषणाः सिंह- मातंगरक्षः प्रभृतयः क्षणात् । शाम्यन्ति व्यन्तराश्चान्ये, ध्यानप्रत्यूहहेतवः ॥७०॥ । ८४२ । मन्त्रः प्रणवपूर्वोऽयं फलमैहिकमिच्छुभिः । ध्येयः प्रणवहीनस्तु निर्वाणपदकाङ्क्षिभिः ॥७१॥ अर्थ :- आठ पंखुडी वाले कमल में झिलमिल तेज से युक्त आत्मा का चिंतन करना और ॐकारपूर्वक प्रथम मंत्र के (ॐ नमो अरिहंताणं) इन आठ वर्णों को क्रमशः आठों पत्रों पर स्थापन करना । प्रथम पंखुडी की गणना पूर्वदिशा से आरंभ करना; उसमें ॐस्थापित करना, बाद में यथाक्रम से शेष सात अक्षर स्थापित करना। इस अष्टाक्षरी मंत्र का कमल के पत्रों पर ग्यारह सौ जाप करना । इस अनुक्रम से शेष दिशाविदिशाओं में स्थापना करके समस्त उपद्रव की शांति के लिए योगी को आठ दिन तक इस अष्टाक्षरी विद्या का जाप करना चाहिए । जाप करते हुए आठ रात्रि व्यतीत हो जाने पर कमल के अंदर पत्रों पर स्थित अष्टाक्षरी विद्या के इन आठों वर्णों के क्रमशः दर्शन होंगे। योगी जब इन ८ वर्णों का साक्षात्कारकर लेता है तो उसमें ऐसा सामर्थ्य प्रकट हो जाता है कि ध्यान में उपद्रव करने वाले भयानक सिंह, हाथी, राक्षस और भूत, व्यंतर, प्रेत आदि उसके प्रभाव से शांत हो जाते हैं। इहलौकिक फल के अभिलाषियों को 'नमो अरिहंताणं' इस मंत्र का ॐकार सहित ध्यान करना चाहिए, परंतु निर्वाणपद के इच्छुक को प्रणव ॐ - रहित मंत्र का ध्यान करना चाहिए। ॐ नमो अरिहंताणं' प्रणवयुक्त मंत्र है ।।६६-७१।। अब मंत्र और विद्या का प्रतिपादन करते हैं अर्थ : ।८४३। चिन्तयेदन्यमप्येनं मन्त्रं कर्मोंघशान्तये । स्मरेत् सत्त्वोपकाराय, विद्यां तां पापभक्षिणीम् ॥७२॥ श्रीमद्-ऋषभादि-वर्धमानान्तेभ्यो नमः इस मंत्र का भी कर्मों के समूह को शांत करने के लिए ध्यान करना चाहिए और समस्त जीवों के उपकार के लिए पापभक्षिणी विद्या का भी स्मरण करना चाहिए। वह इस प्रकार है—ॐ अर्हन्मुखकमलवासिनि ! पापात्मक्षयंकरि ! श्रुतज्ञानज्वालासहस्रज्वलिते! 'सरस्वति! मत्पापं हन हन दह दह क्षॉं क्षीं क्षू क्षक्षः क्षीरधवले! अमृतसंभवे ! वं वं हूं हूं स्वाहा।।७२।। इसका फल कहते हैं ।८४४। प्रसीदति मनः सद्यः, पापकालुष्यमुज्झति । प्रभावातिशयादस्याः, ज्ञानदीपः प्रकाशते ||७३|| अर्थ :- इस विद्या के प्रभाव से मन तत्काल प्रसन्न हो जाता है, पाप की मलिनता नष्ट हो जाती है और ज्ञान का दीपक प्रकाशित हो जाता है ।। ७३ ।। | | ८४५ । ज्ञानवद्भिः समाम्नातं, वज्रस्वाम्यादिभिः स्फुटम् । विद्यावादात् समुद्धृत्य, बीजभूतं शिवश्रियः ||७४|| ||८४६ । जन्मदावहुताशस्य, प्रशान्तिनववारिदम् । गुरूपदेशाद् विज्ञाय, सिद्धचक्रं विचिन्तयेत् ॥७५॥ वज्रस्वामी आदि पूर्व- श्रुतज्ञानी पुरुषों ने विद्याप्रवाद नामक पूर्व में से जिसे उद्धृत किया है और जिसे अर्थ :1. अरिहंत के मुख कमल में रहने वाली सरस्वति अर्थात् जिनवाणी ही है। 426
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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