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## Yogashastra, Fifth Light, Verses 85-92: **If the wind blows continuously in one nadi for six years, death is certain.** If the wind blows in one nadi for five days starting from the first day of the month of Magh, it indicates death within three years. ||81-84|| **Knowledge of Death Through Wind** ||547|| If the wind blows for two, three, or four days in one nadi, then the lifespan should be reduced by that many divisions of the year. For example, if the wind blows in one nadi for five days at the beginning of the month of Margashirsha, death is predicted in eighteen years. If the wind blows for four days instead of five, then the lifespan should be reduced by one-fifth of eighteen years, which is three years, seven months, and six days. This results in a lifespan of fourteen years, four months, and twenty-four days. Similarly, if the wind blows for three or two days, the lifespan should be calculated accordingly. The same rule applies to the months of Sharad and others. ||85|| **Another Method for Determining Lifespan Through Wind** ||548|| Now, I will explain another method for determining lifespan. This method is based on the path of the Sun and is known as the "Paushnakal." ||86|| **The Nature of Paushnakal** ||549|| When the Moon is in the birth nakshatra and the Sun is in the seventh house from its own sign, and the Moon has traversed the same number of birth signs as the Sun has traversed the seventh house, then this period is called "Paushnakal." Death can be determined during this period. ||87|| **Determining Lifespan Through Wind in Paushnakal** ||550|| If the wind blows in the Surya nadi for half a day during Paushnakal, death will occur in the fourteenth year. If the wind blows for a full day, death will occur in the twelfth year. ||88|| ||551|| Similarly, if the wind blows for one day and night, two days, or three days in the Surya nadi during Paushnakal, death will occur in the tenth year, eighth year, and sixth year respectively. ||89|| ||552|| If the wind blows for four days, death will occur in the fourth year. If it blows for five days, death will occur in the third year, or after one thousand eighty days. ||90|| ||553|| If the wind blows continuously for six, seven, eight, nine, or ten days in the Surya nadi, the lifespan will be reduced by one, two, three, four, or five twenty-fours from the total of 1080 days. ||91|| **Explanation of the Above** ||554|| If the wind blows for six days, the lifespan will be one thousand sixty-five days. ||92||
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________________ योगशास्त्र पंचम प्रकाश श्लोक ८५ से ९२ में पवन चलता रहे तो छह वर्ष के अंत में अवश्य मरण होगा। माघ महीने के प्रथम दिन से पांच दिन तक एक ही नाड़ी में वायु चलता रहे तो तीन वर्ष के अंत में मरण होने का सूचित करता है ।।८१-८४ ।। तथा वायु से मृत्यु का काल ज्ञान || ५४७ | सर्वत्र द्वि- त्रि- चतुरो, वायुश्चेद् दिवसान् वहेत् । अब्दभागैस्तु ते शोध्या:, यथावदनुपूर्वशः ||८५ || अर्थ :- किसी महीने में पांच दिन तक एक ही नाड़ी में वायु चले तो उतने ही वर्षों में मरण बतलाया है, उस महीने में दो तीन या चार दिन तक यदि एक ही नाड़ी में वायु चलता रहे तो उस वर्ष के उतने ही विभाग करके दिनों के अनुसार वर्ष के उतने ही विभाग कम कर देने चाहिए। जैसे कि मार्गशीर्ष महीने के प्रारंभ में पांच दिन तक एक ही नाड़ी में वायु चले तो अठारह वर्षों में मरण कहा है, यदि उस मास में पांच के बदले चार दिन तक एक ही नाड़ी में पवन चलता रहे तो अठारह वर्ष के पांचवें भाग के अर्थात् तीन वर्ष सात महीने और छह दिन के कम करने पर चौदह वर्ष चार मास और चौवीस दिन में मृत्यु होना फलित होता है। इसी प्रकार तीन, दो दिन वायु चलता रहे इसी हिसाब से समझ लेना और शरद् आदि के महीने में भी यही नियम समझना चाहिए ।। ८५ ।। अब दूसरे उपाय से वायु के निमित्त से होने वाला कालज्ञान बताते हैं | | ५४८ । अथेदानीं प्रवक्ष्यामि, कञ्चित् कालस्य निर्णयम् । सूर्यमार्गं समाश्रित्य स च पौष्णेऽवगम्यते॥८६॥ अर्थ :- अब मैं कुछ कालज्ञान का निर्णय बताऊंगा, वह काल - ज्ञान सूर्यमार्ग को आश्रित करके पौष्णकाल में जाना जाता है ।। ८६ ।। अब पौष्णकाल का स्वरूप कहते हैं ।५४९। जन्मऋक्षगते चन्द्रे, समसप्तगते रवौ । पौष्णनामा भवेत् कालो, मृत्यु - निर्णय-कारणम् ॥८७॥ अर्थ :- जन्म नक्षत्र में चंद्रमा हो और अपनी राशि से सातवीं राशि में सूर्य हो तथा चंद्रमा ने जितनी जन्म राशि भोगी हो, उतनी ही सूर्य ने सातवीं राशि भोगी हो, तब 'पौष्ण' नामक काल कहलाता है। इस पौष्णकाल में मृत्यु का निर्णय किया जा सकता है ।। ८७ ।। पौष्णकाल में सूर्यनाड़ी में वायु चले तो उसके द्वारा कालज्ञान बताते हैं ||५५० दिनार्धं दिनमेकं च यदा सूर्ये मरुद् वहन् । चतुर्दशे द्वादशेऽब्दे, मृत्यवे भवति क्रमात् ॥८८॥ अर्थ :- उस पौष्णकाल में यदि आधे दिन तक सूर्यनाड़ी में पवन चलता रहे तो चौदहवें वर्ष में मृत्यु होगी, यदि पूरे दिन पवन चले तो बारहवें वर्ष में मृत्यु होती है ।। ८८ ।। ।५५१। तथैव च वहन् वायुः अहोरात्रं द्वयहं त्र्यहम् । दशमाष्टमषष्ठाब्देस्वन्ताय भवति क्रमात् ॥ ८९॥ उसी तरह पौष्णकाल में एक अहोरात्रि, दो या तीन दिन तक सूर्यनाड़ी में पवन चलता रहे तो क्रमशः दसवें वर्ष, आठवें वर्ष और छट्ठे वर्ष मृत्यु होती है ।। ८९ ।। अर्थ : ||५५२ | वहन् दिनादि चत्वारि, तुर्येऽब्दे मृत्यवे मरुत् । साशीत्यहः सहस्रे तु पञ्चाहानि वहन् पुनः ॥ ९० ॥ अर्थ :- उसी प्रकार से पौष्णकाल में चार दिन तक सूर्यनाड़ी में वायु चलता रहे तो चौथे वर्ष में और पांच दिन तक चलता रहे तो तीन वर्ष में अर्थात् एक हजार अस्सी दिन में मृत्यु होती है ।। ९० ।। १५५३। एक-द्वि-त्रि- चतुः - पञ्च- - चतुर्विशत्यहः क्षयात्। षडादीन् दिवसान् पञ्ज शोधयेदिह तद्यथा ॥ ९१ ॥ अर्थ :- सूर्यनाड़ी में लगातार छह, सात, आठ, नौ या दस दिन तक उसी तरह वायु चलता रहे तो वह १०८० दिनों में से क्रमशः एक, दो, तीन, चार और पांच चौवीसी दिन कम तक जीवित रहता है ।। ११ ।। आगे इसे ही चार श्लोकों से स्पष्ट करते हैं । ५५४। षट्कं दिनानामध्यर्कं, वहमाने समीरणे । जीवत्यह्नां सहस्रं षट् पञ्चाशद्दिवसाधिकम् ॥९२॥ 405
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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