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________________ संवरभावना का स्वरूप योगशास्त्र चतुर्थ प्रकाश श्लोक ७९ से ८३ करना, आवश्यक व्रत और शील में अप्रमाद रखना, विनय, ज्ञानाभ्यास, तप, त्याग, बार-बार ध्यान करना, तीर्थप्रभावना, संघ में समाधि करना, साधुओं की सेवा (वैयावृत्य), अपूर्व नवीन ज्ञान ग्रहण करना और दर्शनविशुद्धि इन बीस स्थानकों (तप) की आराधना तीर्थंकरनामकर्म आश्रव का हेतु है। प्रथम तीर्थंकर श्रीऋषभदेव भगवान् और | अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी ने इन बीस स्थानक - तप की आराधना की थी, शेष तीर्थंकरों ने इनमें से एक, दो, तीन या सबकी आराधना की थी। गोत्रकर्म के आश्रव हेतु - दूसरे की निंदा, मजाक, अवज्ञा, अनादर करना सद्गुणों का लोप करना, किसी में दोष | हो या न हो फिर भी दोषों का कथन करना, आत्म प्रशंसा करना, अपने में गुण हो या न हो, लेकिन गुणों का ही कथन | करना, अपने दोषों को छिपाना, जाति आदि का अभिमान करना; ये सब नीचगोत्र - नामकर्म के आश्रवहेतु हैं और इनसे | विपरीत अभिमान रहित रहना, मन, वचन, काया से विनय करना आदि उच्चगोत्र के आश्रव हेतु हैं। अंतरायकर्म के आश्रव हेतु - दान, लाभ, पराक्रम (वीर्य), भोग और उपभोग इनमें कारणवश या अकारण ही विघ्न डालना, अंतराय कर्म के आश्रव का हेतु है। प्रसंगवश यह आश्रव शुभ भी हो जाता है, अन्यथा जीवों को वैराग्य | का कोई निमित्त नहीं रहता । इस प्रकार आश्रव को अशुभ जानकर भव्यजीवों को निर्ममत्व के संपादन हेतु आश्रवभावना का चिंतन करना चाहिए ।।७८ ।। अब संवरभावना का निरूपण करते हैं ।४०५। सर्वेषामाश्रवाणां तु, निरोधः संवरः स्मृतः । स पुनर्भिद्यते द्वेधा, द्रव्यभावविभेदतः ॥७९॥ अर्थ :- पूर्वोक्त सभी आश्रवों को रोकना संवर कहलाता है। यह तो अयोगी केवलियों में ही होता है। यह कथन सर्वसंवर की अपेक्षा से है। एक, दो, तीन आदि आश्रवों को रोकना देशसंवर कहलाता है। सर्वसंवर अयोगकेवली नामक चौदहवें गुणस्थानक में होता है। सर्वसंवर और देशसंवर दोनों के द्रव्य और भाव की अपेक्षा से दो-दो भेद होते हैं ।। ७९ ।। अब उन दो भेदों के संबंध में कहते हैं ।४०६। य: कर्म पुद्गलादानच्छेदः स द्रव्यसंवरः । भवहेतुक्रिया - त्यागः, स पुनर्भावसंवरः ॥८०॥ अर्थ :- आश्रवद्वार से कर्मपुद्गलों के आगमन का निरोध करना, द्रव्यसंवर है और संसार की कारणभूत क्रियाओं का त्याग करना, भावसंवर है ॥८०॥ अब कषाय, विषय, योग आदि से अशुभकर्म हेतु के प्रतिपक्षभूत अर्थात् विरोधी उपाय की महत्ता बताते हैं | | ४०७ | येन येन ह्युपायेन, रुध्यते यो य आश्रवः । तस्य तस्य निरोधाय स स योज्यो मनीषिभिः॥८१॥ जो-जो आस्रव जिस-जिस उपाय से रोका जा सकता है, उसे रोकने के लिए विवेकी पुरुष उस-उस उपाय को काम में लाये ॥ ८१ ॥ | अर्थ : आश्रव के निरोधोपाय बताते हैं | ४०८ | क्षमया मृदुभावेन, ऋजुत्वेनाऽप्यनीहया । क्रोधं मानं तथा माया, लोभं रुन्ध्याद् यथाक्रमम्॥८२॥ संयम प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाला योगी क्षमा से क्रोध को, नम्रता से मान को, सरलता से माया को और संतोष से लोभ को रोके ॥ ८२ ॥ अर्थ : कषायों के प्रतिपक्षी भावों से क्षय बताकर अब विषयों का संवर कहते हैं ।४०९। असंयमकृतोत्सेकान्, विषयान् विषसन्निभान् । निराकुर्यादखण्डेन, संयमेन महामतिः ॥८३॥ अर्थ :- इंद्रियों पर असंयम से प्रबल बने हुए, विषतुल्य विषयों को महाबुद्धिमान मुनि अखंड - संयम से रोके ॥ ८३ ॥ भावार्थ :- विषयसुख भोगते समय मधुर लगता है, लेकिन परिणाम में विष के समान होता है। अतः स्पर्शादिविषयों में उन्मत्त बनी हुई इंद्रियों के सामर्थ्य को अखंड संयम से ही रोका जा सकता है ।। ८३ ।। 362
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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