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________________ सिद्धाणं बुद्धाणं के अर्थ योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १२३ व्याख्या :- सिद्धे का अर्थ है-सफल (यानी यह जिनधर्म निःसंदेह फलयुक्त है) अथवा सिद्ध का अर्थ है-सभी नयों में धर्म व्यापक होने के कारण अथवा सर्वनय इसमें समाविष्ट हो जाते हैं, इस कारण यह सिद्ध है। अथवा कष, छेद और ताप रूप त्रिकोटि से परीक्षित होने के कारण शुद्ध रूप में होने से सिद्ध है। अथवा यह सिद्ध विशेषण श्रुतआगम रूप है। भो! पश्यन्तु भवन्तः आदरपूर्वक आमंत्रण करते हुए कहते हैं-'अजी' आप देखिए तो सही कि इतने अर्से तक मैंने यथाशक्ति सदा संयमाभिवर्द्धक जिस जिनधर्म की आराधना में प्रसन्नता पूर्वक प्रत्यन किया है, उस जिनमत को नमस्कार हो-णमो जिणमए। इस प्रकार प्रत्यनशील मैं दूसरों की साक्षी से नमस्कार करता हूं। यहां प्राकृत भाषा के अनुसार चतुर्थी विभक्ति के अर्थ में सप्तमी विभक्ति हुई है। इस श्रुतज्ञान रूप धर्म के योग में नंदी सया संजमे अर्थात् हमेशा चारित्र में आनंद और संयम में वृद्धि होती है। श्रीदशवैकालिक सूत्र में कहा है कि पढमं नाणं तओ दया अर्थात् पहले ज्ञान और बाद में दया (संयम) होती है। वह संयमधर्म कैसा है! उसे कहते हैं देवं-नाग-सुवण्णकिन्नरगणस्सब्भूअ भावच्चिए अर्थात् वैमानिक देव, धरणेन्द्र, नागदेव, सुपर्णकुमार, किन्नर, व्यंतरदेव उपलक्षण से ज्योतिषी आदि सभी देव उस संयमधर्म का शुद्ध अंतःकरण के भाव से पूजन करते हैं। यहां देव पर अनुस्वार है, वह छंदशास्त्र के नियमानुसार पादपूर्ति के लिए समझना चाहिए। तथा देवता आदि से हमेशा संयमी पूजित हैं ही। और जिनधर्म का वर्णन करते हैं-लोगो जत्थ पइडिओ जगमिणं अर्थात् जिस जिनमय धर्म में लोक-दृश्यमान लोक या जिस (ज्ञानलोक) से सारा जगत् देखा जाय, उस ज्ञान से यह संसार प्रतिष्ठित है, क्योंकि जितना भी शुद्ध ज्ञान है वह |जिनागम के अधीन है: यह जगत तो ज्ञेय रूप में हैं। तात्पर्य यह है कि जिनदर्शन रूप आगम की से ज्ञान प्रकट होता है और ज्ञान जिनागम में है तथा समस्त जगत भी आगम से देखा या समझा जाता है। इसलिए यह जगत् भी जिनागम में ही निहित है। कितने ही मनुष्य इस दृश्यमान लोक (सृष्टि) को जगत् मानते हैं, वह ठीक नहीं। इसलिए यहां जगत् का विशेषण दिया है-तेलुक्कमच्चासुरं अर्थात् मनुष्य, देव व उपलक्षण से शेष सभी जीव यानी ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और तिर्यग्लोक रूप आधारजगत् और उसमें रहे हुए सभी जीव-अजीवादिभाव रूप आधेयजगत् है। इस तरह आधार रूप आधेय रूप सारा जगत् जिनदर्शन में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार जिनमत रूप यह धम्म (श्रुतचारित्र रूप) धर्म सासओ कभी नाश न होने वाला अविनाशी धर्म; वड्वउ बढ़े। वह किस तरह से? विजयओ धम्मुत्तरं अर्थात् मिथ्यावादियों पर विजय पाता हुआ तथा श्रुतधर्म की आराधना के बाद चारित्रधर्म में वड्डउ-वृद्धि हो। श्रुतधर्म की आराधना से चारित्रगुण में वृद्धि होती है, इसलिए कहा-मोक्षार्थी को हमेशा ज्ञानवृद्धि करनी चाहिए और तीर्थंकरनामकर्म के कारणों में एक कारण यह भी बताया है-अपुव्वनाणगहणे अर्थात् अपूर्व-अभिनव, ज्ञान-ग्रहण करने से तीर्थकर-नामकर्म बंधन होता है। यह प्रार्थना मोक्षबीज के समान होने से वास्तव में आशंसा रहित है। इसलिए यह प्रणिधान प्रार्थना करके; श्रुत को ही वंदन करने के लिए कायोत्सर्ग के निमित्त सुअस्स भगवओ करेमि काउस्सग्ग का पाठ-वंदण वत्तियाए से लेकर अप्पाणं वोसिरामि तक बोलना चाहिए। इसका अर्थ पहले कह आये हैं। केवल सुअस्स भगवओ का अर्थ बाकी है। श्रुतभगवान् का अर्थ है-प्रथम सामायिक सूत्र (करेमि भंते सूत्र) से लेकर बिन्दुसार नाम के दृष्टिवाद के अंतिम अध्ययन तक अर्थात् द्वादशांगी रूप समग्र 'श्रुतः' यश, प्रभाव आदि भगों से ऐश्वर्यों से युक्त होने से भगवत्स्वरूप श्र की आराधना करने के लिए काउस्सग्ग करता हूं। इसके बाद पहले की तरह का काउस्सग्ग पारकर श्रुत की तीसरी स्तुति बोलनी चाहिए। तत्पश्चात् श्रुत में कही हुई अनुष्ठान-परंपरा के फल रूप सिद्ध भगवान् को नमस्कार करने के लिए निम्नोक्त गाथा बोले सिद्धाणं बद्धाणं, पारगयाणं परंपरगयाणं । लोअग्गमुवगयाणं, नमो सया सव्वसिद्धाणं ॥१॥ अर्थ :- सिद्ध. बुद्ध. संसार-पारंगत एवं परंपरा से सिद्ध बने हुए, लोक के अग्रभाग पर स्थित सर्वासद्धों को मेरा नमस्कार हो ॥१॥ सिद्धाणं – अर्थात् सिद्ध यानी कृतकृत्य बने हुए, जो गुणों से सिद्ध है, पूर्ण हो गये हैं, भौतिक विषयों की जिन्हें कोई भी ईच्छा नहीं है। पकाये हुए चावल फिर से नहीं पकाये जाते, उसी तरह सिद्ध हुए, फिर किसी भी प्रकार की 277
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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