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________________ 'सिद्धाणं बुद्धाणं' गाथा पर विवेचन योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १२३ साधना की ईच्छा नहीं रखते। ऐसे सिद्ध-भगवंतों को नमस्कार करता हूं। इस प्रकार वाक्यसंबंध जोड़ लेना चाहिए। उसमें भी सामान्यता से कर्म सिद्धआदि अनेक प्रकार से सिद्ध होते हैं। जैसे कि शास्त्रों की टीका में कहा है-१. कर्म, | २. शिल्प, ३. विद्या, ४. मंत्र, ५. योग, ६. आगम, ७. अर्थ, ८. यात्रा, ९. अभिप्राय, १०. तप और ११. कर्मक्षय इस प्रकार इन ११ बातों में सिद्ध होते हैं। १. कर्मसिद्ध-किसी आचार्य के उपदेश के बिना ही किसी ने भार उठाने, खेती करने, व्यापार करने इत्यादि कार्यों में से कोई कर्म बारबार किया और उस कर्म में वह सह्यगिरि-सिद्ध के समान निष्णात हो गया, तब उसे कर्मसिद्ध कहते हैं। २. शिल्पसिद्ध - किसी आचार्य के उपदेश से कोई लुहार, सुथार, चित्रकला आदि शिल्पकलाओं में से किसी कला का अभ्यास करके कोकास सुथार के समान पारंगत हो जाता है; वह शिल्पसिद्ध होता है। ३.-४. विद्यासिद्ध, मंत्रसिद्ध-होम, जाप आदि से फल देने वाली विद्या कहलाती है और जप आदि से रहित केवल मंत्र बोलने से सिद्ध हो, वह मंत्र है। विद्या की अधिष्ठायिका देवी होती है, जबकि मंत्र का अधिष्टायक देव हो किसी विद्या का अभ्यास करते-करते किसी ने सिद्धि प्राप्त कर ली हो, वह आर्य खपुटाचार्य के समान विद्यासिद्ध कहलाता है। और किसी मंत्र को सिद्धकर ले, वह स्तंभाकर्ष के समान मंत्रसिद्ध हो जाता है। ५. योगसिद्ध- अनेक औषधियों को एकत्रित करके लेप, अंजन आदि तैयार करने में निष्णात हो, वह आर्य समिताचार्य के समान योगसिद्ध कहलाता है। ६. आगमसिद्ध - आगम अर्थात् द्वादश (बारह) अंगों एवं उपांगों तथा सिद्धांतों, नयनिक्षेपों आदि प्रवचनों व उसके असाधारण अर्थों का गौतमस्वामी के समान विज्ञाता आगमसिद्ध होता है। ७. अर्थसिद्ध-अर्थ अर्थात् धन। मम्मन के समान दूसरों की अपेक्षा जो अत्यधिक धन प्राप्त करने में कुशल हो, वह अर्थसिद्ध होता है। ८.यात्रासिद्धजलमार्ग अथवा स्थलमार्ग में जो निर्विघ्न रूप से तुंडिक के समान यात्रा पूर्ण कर चुका है, वह यात्रासिद्ध होता है। ९. | अभिप्रायसिद्ध-जिस कार्य को जिस तरह करने का अभिप्राय (इरादा) किया हो, उसे अभयकुमार के समान उसी तरह सिद्ध कर ले, वह अभिप्रायसिद्ध कहलाता है। १०. तपःसिद्ध-दृढ़प्रहारी के समान जिसमें सर्वोत्कृष्ट तप करने का सामर्थ्य प्रकट हो गया हो, वह तपःसिद्ध है और ११. कर्मक्षयसिद्ध-मरुदेवी माता के समान ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्मों को मूल से नष्ट करने से जो सिद्ध हो जाता है, या हुआ हो; वह कर्मसिद्ध कहलाता है। उपर कहे हुए ११ प्रकार के सिद्धों में से दस को छोड़कर यहां ग्यारहवें कर्मक्षयसिद्ध को ग्रहण करना चाहिए। ऐसे कर्मक्षयसिद्ध को नमस्कार करने के कारण साधक सिद्ध हो जाता है। | बुद्धाणं - अर्थात् बोधित। अज्ञान रूपी निद्रा में सोये हए जगत में दूसरों के उपदेश बिना जीवादि तत्त्वों के स्वरूप को जानकर बोधित हए। अर्थात बोध-(ज्ञान) होने के बाद कर्मों का सर्वथा नाश करके जो सिद्ध हए हैं. उनको मेरा नमस्कार हो। कोई दार्शनिक यह कहते हैं कि-सिद्ध सिद्धावस्था में संसार और निर्वाण का त्याग करके रहते हैं, जगत् के कल्याण के लिए वे संसार या निर्वाण में नहीं रहते और जगत् उनका स्वरूप नहीं जान सकता। वे चिंतामणिरत्न से भी बढ़कर और महान् है। उनके मत का खंडन करने हेतु कहते हैं-पारगयाणं संसार का पार पाने वाले यानी संसार के प्रयोजन का अंत पाने वाले, सिद्धों को नमस्कार हो। इस विषय में यदृच्छावादियों का कहना है-जैसे कोई दरिद्र सहसा राजा हो जाता है, वैसे जीव भी सहसा सिद्ध हो जाता है; इसमें क्रम जैसी कोई वस्तु नहीं है; इस बात का खंडन करते हुए कहते हैं-परंपरगयाणं इसका अर्थ है-परंपरा से बने हुए सिद्ध। तात्पर्य यह है-परंपरा से चौदह गुणस्थानक के | क्रम से जिन्होंने आत्मा का पूर्ण विकास कर लिया है. वे अथवा किसी प्रकार कर्म के क्षयोपशम आदि के योग से प्रथम | सम्यग्दर्शन फिर सम्यग्ज्ञान और उसके बाद सम्यक्चारित्र; इस क्रम से गुणों का विकास करते हुए परंपरा से सिद्ध रूप मोक्षस्थान जिन्होंने प्राप्त किया है, उन्हें नमस्कार करता हूं। कितने ही दार्शनिक मोक्ष का स्थान, जो नियत है, उसे | | अनियत मानते हैं। उनका कहना है-जब आत्मा के संसार का अथवा अज्ञान रूपी क्लेश नाश होता है वहां उनका विज्ञान स्थिर रहता है और क्लेश का सर्वथा अभाव हो जाने से इस संसार में उसे कदापि लेशमात्र भी बाधा अथवा दुःख नहीं होता है, उनकी इस मान्यता का खंडन करने के लिए कहते हैं-लोअग्गमुवगयाणं लोक के अग्रभाग में चौदह राज लोक पर अंत भाग में 'इषत्प्राग्भारा' नाम की सिद्धशिला पृथ्वी है, उसके उप यानी समीप में; न कि अन्य स्थान में। सभी सिद्ध कर्मों का क्षय करके उसी स्थान पर स्थित है। कहा भी है-जहां सिद्ध की एक आत्मा है, वही पर कर्मों का क्षय करके जन्म-मरण से मुक्त हुई अनंत दूसरी सिद्ध आत्माएँ एक दूसरे को बाधा पहुंचाए बिना, 278
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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