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________________ चौबीस तीर्थंकरों के अन्वयार्थक नाम रखने का तात्पर्य योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १२३ विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ और शांतिजिन को मैं वंदन करता हूं ।।४।। कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रतस्वामी और नमिजिन को मैं वंदन करता हूं और अरिष्टनेमि, पार्श्वनाथ तथा वर्धमान (महावीर) स्वामी को मैं वंदन करता हूं ।।५।। । उपर्युक्त तीनों गाथाओं का अर्थ एक साथ कहकर अब उसी अर्थ को विभागपूर्वक. यानी सामान्य और विशेष रूप से कहते हैं, जो तीर्थंकर भगवान् में घटित हो सकता है। उसमें १. ऋषभदेव = उसभ=ऋषभ का सामान्य अर्थ हैजो परमपद-मोक्ष को प्राप्त करता है; वह ऋषभ है। ऋषभ शब्द का प्राकृतभाषा में उद् ऋत्वादौ ।।८।१।१३१।। सूत्र |से उसहो रूप बनता है। ऋषभ का दूसरा रूप वृषभ भी मिलता है। उसका अर्थ है-वर्षतीति वृषभः अर्थात् जो दुःख | रूपी अग्नि से जलते हुए जगत् को शांत करने हेतु उपदेश रूपी वर्षा करता है; वह वृषभ है। वृषभे वा वा।।८।१।१३३।। सिद्धहैम-सूत्र से वृ को उ करने से उसहो रूप होता है, उसी का यह उसभ रूप है। विशेष अर्थ यों| है-भगवान् की जंघा पर वृषभ का लांछन (चिह्न) होने से और माता मरुदेवी ने स्वप्न में सर्वप्रथम वृषभ देखा था, इसलिए भगवान् का नाम वृषभ अथवा ऋषभ रखा गया था। २. अजितनाथ - परिषह आदि से नहीं जीता जा सका, इससे वह अजित है, यह सामान्य अर्थ है। विशेष अर्थ इस प्रकार है-जब भगवान् गर्भ में थे, तब उनकी माताजी राजा के साथ चौपड़ (पासा) खेल रही थी। राजा से नहीं जीतने के कारण प्रभु का नाम अजित रखा। २. संभवनाथ- जिनमें चौतीस अतिशय रूपी गुण विशेष प्रकार से संभव है, अथवा जिनकी स्तुति करने से 'शं' अर्थात् सुख प्राप्त होता है। इसमें 'शषोः सः ।।८।१।२६० ।। सूत्र से प्राकृत-नियम के अनुसार शंभव के बदले संभव रूप होता है। यह सामान्य अर्थ है और विशेष अर्थ यह है-भगवान् जब गर्भ में आये थे, तब देश में आशा से अधिक अन्न पैदा होना संभव हुआ, इसलिए उनका नाम संभव रखा। ३. अभिनंदनस्वामी - देवेन्द्रों ने जिनका अभिनंदन किया है तथा प्रभु जब गर्भ में आये थे, तब इंद्र आदि ने बार-बार माता को अभिनंदन दिया था, इस कारण उनका नाम अभिनंदन रखा। ५. सुमतिनाथ- सुमति का अर्थ है-जिसकी सुंदर बुद्धि हो। भगवान् जब माता के गर्भ में थे, तब माता को सुंदर निश्चय करने वाली मति-बुद्धि प्रकट हुई थी, अतः उनका नाम सुमति रखा। ६. पद्मप्रभ – 'निष्पंकता-गुण की अपेक्षा से पद्म के समान कांति वाले होने से पद्मप्रभ और भगवान् जब गर्भ में थे, तब माता को पद्म (कमल) की शय्या में . सोने का दोहद उत्पन्न हुआ था, जिसे देवता ने पूर्ण किया था तथा प्रभु के शरीर की कांति पद्म-(कमल) के समान लाल होने से पद्मप्रभ नाम रखा। ७. सुपार्श्वनाथ- शरीर का पार्श्वभाग जिसका सुंदर है, उसे सुपार्श्व (नाथ) कहते हैं। तथा गर्भ में थे, तब माता के भी पास में सुंदर शरीर था इसलिए उनका नाम सुपार्श्व रखा। ८. चंद्रप्रभ-चंद्र की किरणों के समान शांत लेश्या वाली जिसकी प्रभा है, वह चंद्रप्रभ है; तथा गर्भ के समय माता को चंद्रपान करने का दोहद उत्पन्न हुआ था और भगवान् के शरीर की प्रभा चंद्र-समान उज्ज्वल थी इसलिए भगवान् का नाम चंद्रप्रभ रखा था। ९. सुविधिनाथसु अर्थात् सुंदर और विधि अर्थात् सब विषयों में कुशलता वाले सुविधिनाथ भगवान् थे। प्रभु जब गर्भ में आये, तब से माता को सभी विषयों में कुशलता प्राप्त हुई थी, इससे प्रभु का नाम सुविधिनाथ रखा तथा इनके दांत फूल की कलियों के समान होने से दूसरा नाम पुष्पदंत भी था। १०. शीतलनाथ – सभी जीवों के संताप को हरण करके शीतलता प्रदान करने वाले होने से शीतलनाथ तथा प्रभु गर्भ में थे, तब पिता को पहले से पित्तदाह हो रहा था, जो किसी भी उपाय से शांत न होता था; परंतु गर्भ के प्रभाव से माता के हस्तस्पर्श से वह शांत हो गया, इसलिए उनका नाम शीतलनाथ रखा गया था। ११. श्रेयांसनाथ – सारे जगत् में प्रशस्त अथवा श्रेयस्कर भुजाएँ आदि होने से श्रेयांस कहा। तथा प्रभु गर्भ में थे, तब किसी के भी उपयोग में न आयी, देवाधिष्ठित शय्या के सर्वप्रथम उपयोग का श्रेय माता को प्राप्त हुआ था, इससे उनका नाम श्रेयांस रखा। १२. वासुपूज्यस्वामी - धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, प्रत्यय और प्रभास ऐसे आठ वसु जाति के देव हैं, उनके पूज्य होने से वसुपूज्य 'प्रज्ञादिभ्योऽण' ऐसे व्याकरण सूत्र से वासुपूज्य तथा भगवान् गर्भ में थे, तब से वसु यानी हिरण्य (सोने) से इंद्र ने राजकुल की पूजा की थी, इस कारण वासुपूज्य अथवा वसुपूज्य राजा के पुत्र होने से वासुपूज्य कहलाए। १३. विमलनाथ – जिसका मल चला गया है, उसे विमल कहते हैं। अथवा ज्ञान 272
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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