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________________ तीर्थंकर के मुक्त होने के बाद की स्थिति का स्तुतिमूलक वर्णन योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १२३ उस विचित्र कर्मबंधन से भगवान् मुक्त हैं, वे कृतकृत्य है, उनका कार्य पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुका है। किन्तु जगत्कर्ता के ब्रह्म में लीन हो जाने को पूर्णता मानने से सिद्ध आत्मा की पूर्णता नहीं होती। क्योंकि उनके मतानुसार ब्रह्मा पुनः जगत् की रचना करते हैं, इसलिए आत्मा की पूर्णता का कार्य अधूरा ही है। इतना ही नहीं, परंतु जगत् की रचना में एक को हीन दूसरे को उत्तम बनाने से ब्रह्मा में रागद्वेष की भी सिद्धि होती है; क्योंकि रागद्वेष के बिना जीवों की सुखदुःख युक्त अवस्था कैसे बनायी जा सकती है? कोई किसी में विलीन हो (मिल) जाय, वह बात भी असंगत है; क्योंकि ऐसा होने पर तो उस आत्मा का अस्तित्व ही खत्म हो गया, उसका तो सर्वथा अभाव हो गया। इस कारण जगत्कर्ता में मिलने की बात अज्ञानमूलक है। अतः यह सिद्ध हो जाता है कि तीर्थकर की आत्मा स्वयं कर्म से मुक्त होती है, उसी तरह वह दूसरी आत्माओं को (प्रेरणा देकर) कर्म-बंधन से मुक्त भी करती है। अतः भगवान् स्वयं मुक्त है और दूसरों को मुक्त कराते हैं। इस तरह भगवान् रागद्वेष को जीतने-जीताने वाले, तरने-तराने वाले, ज्ञानवान एव ज्ञानदाता, मुक्त और मुक्त कराने वाले होने से वे अपनी तरह दूसरों को भी सुखफल देने वाले हैं। इस तरह चार पद से 'अपने समान दूसरे को फल देने वाले' नाम की आठवीं संपदा कही। अब 'बुद्धि के योग से ज्ञान होता है', ऐसा मानने वाले सांख्यदर्शनकार भगवान् को सर्वज्ञ और सर्वदर्शी नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि 'बुद्ध्यध्ववसितमर्थ पुरुषश्चेतयते' अर्थात् बुद्धि से विचारे हुए अर्थ को ही आत्मा जानता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मा स्वयं ज्ञानदर्शन वाला नहीं हो सकता; परंतु बुद्धि के द्वारा होने वाले अध्यवसाय से ही वह पदार्थ को जान सकता है। उनकी इस मान्यता का खंडन करते हुए कहते हैं-'सव्वन्नूणं सव्वदरिसीणं' अर्थात् समस्त पदार्थों को जाने, वह सर्वज्ञ और सब को देखे, वह सर्वदर्शी है। ऐसे सर्वज्ञाता सर्वदृष्टा भगवान् को नमस्कार हो। आत्मा का स्वभाव स्वयं जानना और देखना है, परंतु कर्म रूपी आवरण से वह अपने स्वभाव का उपयोग नहीं कर सकता है, जब कर्म-आवरण हट जाता है, तब ज्ञान-दर्शन-रूप स्व-स्वभाव से आत्मा सर्व पदार्थों को जानता देखता है। कहा भी है कि आत्मा स्वयं स्वभावतः निर्मल चंद्र-समान है, चंद्रकिरणों के समान आत्मा का ज्ञान है। चंद्र पर जैसे बादल के आवरण आ जाते हैं, वैसे ही जीव पर कर्म रूपी बादल छा जाते हैं। और ऐसा एकांत भी नहीं है कि आत्मा की बुद्धि रूपी कारण के बिना बुद्धि का फल रूप विज्ञान नहीं होता। वास्तव में कारण, कार्य की सिद्धि तक ही उपयोगी होता है, उसके बाद उसकी आवश्यकता नहीं है। जीव के कर्म रूप आवरण, जब तक टूटते नहीं, जब तक बुद्धि रूप कारण की आवश्यकता रहती है, परंतु संपूर्ण आवरण टूटने के बाद आत्मा का ज्ञान स्वभावतः स्वतः प्रकट हो जाता है; बुद्धि उसके लिए कोई उपयोगी नहीं रहती। जिसमें तैरने की शक्ति न हो, उसके लिए नौका आदि उपयोगी होती है; परंतु जिसमें तैरने की शक्ति प्रकट हो गयी हो उसे नौका आदि की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह भगवान् में सहज ज्ञानदर्शन गुण पूर्णतया प्रकट हो चुके हैं, फिर उन्हें बुद्धि की आवश्यकता नहीं है, वे उसके बिना सब कुछ जान सकते हैं और देख सकते हैं। अतः बुद्धि रूप कारण के बिना ही वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है। दूसरे भी ऐसा कहते हैं कि ज्ञान सभी पदार्थों के |विशेषधर्म को बताता है और दर्शन सामान्यधर्म को। इसलिए एक दूसरे का विषय नहीं होने से 'सर्व जानते हैं और सवे देखते हैं; ऐसा कहना अयुक्त है। कदाचित् ज्ञान और दर्शन दोनों मिलकर सब कुछ जान या देख सकते हैं, यह कहना युक्तियुक्त है। ज्ञान स्वतंत्रता से न तो जान सकता है और न देख सकता है, यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि वस्तुतः सामान्य और विशेष इन दोनों में भिन्नता नहीं है। जिस पदार्थ में सामान्यधर्म है, उस पदार्थ में विशेष का भी धर्म होता है। अर्थात् सामान्य और विशेष धर्म जिस पदार्थ का है, उसका पदार्थ-रूप धर्म का आधार (धर्मी) एक ही है और इससे उसके उसी भाव को जीव ज्ञानस्वभाव से तारतम्य रूप में और दर्शनस्वभाव से सामान्य-रूप में जानता है और देखता है। क्योंकि सर्वपदार्थ ज्ञान-दर्शन के विषय रूप बनते है। यहां फिर शंका करते हैं कि ज्ञान से समस्त पदार्थों का विशेष तारतम्य-रूप धर्म दिखता है, परंतु उनमें निहित सामान्य धर्म नहीं दिखता और दर्शन से सर्वपदार्थों में सामान्य धर्म दिखता है; परंतु उनमें निहित तारतम्य रूप विशेषधर्म नहीं दिखता। इन दोनों में से प्रत्येक दोनों धर्मों को नहीं जानता; अपित. दोनों धर्मों से केवल एक धर्म को जानता है। किन्तु जो यह मानते हैं कि एक धर्म का ज्ञाता ज्ञान सर्वज्ञाता है। तथा एक ही धर्म का दृष्टा दर्शन सर्वदर्शी है, यह अनुचित है। इसका उत्तर यों देते हैं 'यह कहना यथार्थ नहीं है; 267
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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