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________________ नमोत्थु की व्याख्या योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक १२३ के समान हैं। यह कथन असत्य भी नहीं है; क्योंकि सिंह के समान इत्यादि उपमा देने से उनके असाधारण गुण प्रतीत होते हैं। भगवान् को सजातीय की उपमा देनी चाहिए, विजातीय की उपमा से तो 'विरुद्धोपमायोगे तद्धर्मापत्त्या तदवस्तुत्वम्' अर्थात् विरुद्ध (विजातीय) उपमा के योग से उपमेय में उपमा का धर्म आ जाने से उपमेय की वास्तविकता | नहीं रहती । इस न्याय से उपमेय में उपमान के समान धर्म आ जाने से भगवान् में पुरुषत्व आदि का अभाव हो जायगा; | चारुशिष्यों के इस मत का खंडन करते हुए कहते हैं- पुरिसवरपुंडरीआणं अर्थात् पुरुष होने पर भी श्रेष्ठ पुंडरीक के | समान अरिहंत को नमस्कार हो । संसार रूपी जल से निर्लिप्त इत्यादि, धर्मों के कारण वे श्रेष्ठ पुंडरीक कमल के समान | जैसे पुंडरीक - कमल कीचड़ में उत्पन्न होता है, जल में बढ़ता है, फिर भी दोनों का त्यागकर दोनों से ऊपर रहता है। वह स्वाभाविक रूप में सुंदर होता है, त्रिलोक की लक्ष्मी का निवास-स्थान है, चक्षु आदि के लिए आनंद का घर है, उसके उत्तम गुणों के योग से विशिष्ट तिर्यंच, मनुष्य और देव भी कमल का सेवन करते हैं; तथा कमल सुख का हेतुभूत है, वैसे ही अरिहंत परमात्मा भी कर्म रूप कीचड़ में जन्म लेते हैं, दिव्यभोग रूपी जल से उनकी वृद्धि होती है, फिर भी वे कर्मों और भोगों का त्यागकर उनसे निर्लेप रहते हैं, अपने अतिशयों से वे सुंदर हैं और गुण रूपी संपत्तियों के निवास स्थान है; परमानंद के हेतु रूप हैं; केवलज्ञानादि गुणों के कारण तिर्यंच, मनुष्य और देव भी उनकी सेवा करते हैं, और इससे वे मोक्षसुख के कारण बनते हैं। इन कारणों से अरिहंत भगवान् पुंडरीककमल के समान है। इस | तरह भिन्नजातीय कमल की उपमा देने पर भी अर्थ में कोई विरोध नहीं आता । सुचारु के शिष्यों ने विजातीय की उपमा | देने से, जो दोष बताया है, वह दोष यहां संभव नहीं है। यदि विजातीय उपमा के देने से उपमेय में उस उपमा के | अतिरिक्त अन्य धर्म भी आ जाते हैं, वैसे ही सिंह आदि की सजातीय उपमा से उस सिंह आदि का पशुत्व आदि धर्म | आ जाता है। किन्तु सजातीय उपमा से वैसे नहीं बनता; वैसे ही विजातीय उपमा से भी वह दोष नहीं लगता। बृहस्पति के शिष्य ऐसा मानते हैं कि यथोत्तरक्रम से गुणों का वर्णन करना चाहिए। अर्थात् प्रथम सामान्य गुणों का, बाद में उससे विशेष गुणों का और उसके बाद उससे भी विशिष्ट गुणों का यथाक्रम से वर्णन करना चाहिए। यदि इस क्रमानुसार व्याख्या नहीं की जाती है तो वह पदार्थ क्रम रहित हो जाता है और फिर गुण तो क्रमशः ही बढ़ते हैं। इसी के समर्थन में वे कहते हैं - अक्रमवदसत् अर्थात् जिसका विकास क्रमशः नहीं होता, वह वस्तु असत् ( मिथ्या) है। श्री अरिहंत | परमात्मा के गुणों का विकास भी क्रमशः हुआ है। इसे बताने के लिए प्रथम सामान्य उपमा, बाद में विशिष्ट उपमा देनी | चाहिए। उनके इस मत का खंडन करने के लिए कहते हैं- पुरिसवरगंधहत्थीणं अर्थात् श्रीअरिहंत भगवान् पुरुष होने | पर भी श्रेष्ठ गंधहस्ती के समान हैं। जैसे गंधहस्ती की गंधमात्र से उस प्रदेश में घूमने वाले क्षुद्र हाथी भाग जाते हैं, | वैसे ही अरिहंत परमात्मा के प्रभाव से, परराज्य का आक्रमण, दुष्काल, महामारी आदि उपद्रव रूपी क्षुद्र हाथी उनके | विहार रूपी पवन की गंध से भाग जाते हैं। इस कारण से भगवान् श्रेष्ठगंधहस्ती के समान है। यहां पहले सिंह की, बाद में कमल की और उसके बाद गंधहस्ती की उपमा दी है। इसमें गंधहस्ती से भी सिंह विशेष बलवान है; जब कि कमल सामान्य है। अतः उनके मत से उपमा का अक्रम है, फिर भी वह दोष रूप नहीं है, क्योंकि वे कहते हैं कि | 'व्याख्या में क्रम न हो तो व्याख्या ही असत् होती है।' यह बात युक्तियुक्त नहीं है। वस्तुतः सामान्य हो या विशिष्ट, | समस्त गुण आत्मा में परस्पर सापेक्ष रहते हैं। इसलिए उन गुणों या गुणी भगवान् की स्तुति क्रम से या व्युत्क्रम से किसी भी तरह से की जाय; उसमें कोई दोष नहीं लगता । इस प्रकार पुरिसुत्तमाणं आदि चार पदों से श्री अरिहंत परमात्मा की स्तुति का विशेष हेतु कहा। इस तरह यह तीसरी संपदा का नाम 'स्तोतव्य विशेषहेतुसंपदा है।' ही स्तुति करने योग्य श्रीवीतराग परमात्मा सामान्य रूप से इस संसार में किस तरह उपयोगी है? इसे बताने के लिए अब पांच पदों द्वारा चौथी संपदा का वर्णन करते हैं- लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहियाणं, लोगपईवाणं, लोगपज्जोअगराणं । जो शब्द समूह का वाचक होता है, व्याकरणशास्त्रानुसार वह शब्द अनेक अवयवों (अंशों या विभाग) का भी वाचक होता है। लोक शब्द तत्त्वतः धर्मास्तिकायादि पांच अस्तिकायों के समूह वाले चौदह राज लोक का वाचक है। और उसके विपरीत जहां धर्मास्तिकाय आदि द्रव्यों का अभाव हो, केवल आकाश ही हो, उसे अलोक | कहते हैं । फिर भी यहां लोक शब्द से सर्वभव्यजीव रूप लोक समझना चाहिए। यहां पर भगवान् को 'लोकोत्तम' कहा 262
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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