SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 27
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ इंद्र द्वारा देव सभा में प्रशंसा, एक देव का परीक्षा करने आना, दीक्षा योग शास्त्र प्रथम प्रकाश श्लोक १-२ पूज्य, महापुरुषों से भी महान्, आचार्यों के भी आचार्य, बड़ों के भी बड़े, हे भगवन्! आपको नमस्कार हो। केवलज्ञान से विश्व में व्याप्त, योगियों के स्वामी, योग के धारक, स्वयं पवित्र और दूसरों को पवित्र करने वाले, अनुत्तर श्रेष्ठपुरुष! आपको नमस्कार हो। योगाचार्य, आत्मा को कर्ममल से रहित कर निर्मल करने वाले, श्रेष्ठ, अग्रगण्य, वाचस्पति, मंगलस्वरूप हे भगवन्! आपको नमस्कार हो। सबसे प्रथम उदय हुए, अपूर्ववीर! सूर्यस्तुति (ॐ भूर्भुवः स्वः) के सदृश वचनों से स्तुति करने योग्य, हे प्रभु आपको नमस्कार हो। सर्व-जीवों के हितकारी, सर्व-अर्थ के साधक, अमरत्व को प्राप्त, उदीयमान सूर्य, ब्रह्मचर्य के धारक, संसारसमुद्र से पार उतरने वाले, कौशल्यवान, निर्विकारी, विश्वरक्षक, वज्रऋषभनाराचसंहनन से युक्त शरीर वाले, यथार्थ वस्तुतत्त्व के दर्शक! आपको नमस्कार हो। त्रिकाल, जिनेन्द्र, स्वयंभु, ज्ञान, बल, वीर्य, तेज, शक्ति और ऐश्वर्य से संपन्न, प्रभो! आपको नमस्कार हो। धर्म के आदिपुरुष, परमेष्ठी, महादेव, ज्योतिस्तत्त्वस्वरूप, हे स्वामिन्! आपको नमस्कार हो। सिद्धार्थ राजा के कुल रूपी समुद्र के लिए चंद्रमा के समान, तीनों लोकों के स्वामी! भगवान् श्री महावीर प्रभो! आपको नमस्कार हो। इन्द्र ने इस प्रकार के स्तुति पाठ से नमस्कार किया और प्रभु को लेकर वापिस उन्हें उनकी माता को सौंपा। प्रभु के माता-पिता ने अपने घर में धन-धान्य की वृद्धि होने से उसके अनुरूप प्रभु का नाम 'वर्धमान' रखा। देवों और असुरों में भगवान् की सेवा-भक्ति करने की होड़ लग गयी। अमृतवृष्टि करने वाले पीयूषवर्षी नेत्रों से पृथ्वीतल को सिंचन करते हुए, एक हजार आठ लक्षण वाले स्वाभाविक गुणों से वृद्धि को प्राप्त कर क्रमशः वय से भी भगवान् बढ़ने लगे। ____ एक बार अद्वितीय बलशाली वर्धमान बाल्यावस्था के कारण समवयस्क राजपुत्रों के साथ खेल खेलने गये। उस समय इन्द्र ने अवधिज्ञान से जानकर देवसभा में प्रशंसा की कि "सारे जगत् में महावीर प्रभु से बढ़कर कोई वीर नहीं है।" एक ईर्ष्यालु देवता इस बात से क्षुब्ध हो उठा और उसने वर्धमान को विचलित करने का बीड़ा उठाया। वह सीधा वहां आ पहुंचा, जहां बालक वर्धमान अपने हमजोली समवयस्क लड़कों के साथ आमलकी क्रीड़ा खेल रहे थे। देव ने कपट पूर्वक सर्प का रूप बनाया और वह पेड़ से लिपट गया। उस भयंकर सर्प को देखकर सभी राजकुमार डरकर इधर-उधर भाग गये। परंतु वर्धमान ने हँसते-हँसते रस्सी की तरह साँप को पकड़कर जमीन पर फेंक दिया। शर्मिंदा बने हुए राजकुमार फिर खेलने आये। देव ने अब कुमार का रूप धारण किया और फिर वहाँ आ पहुंचा। सभी बालक वृक्ष पर चढ़ गये। वर्धमान तो पहले से ही वृक्ष की चोटी पर चढ़ गये थे। लोक के अग्रभाव (मोक्ष) पर जाने वाले के लिए वृक्ष के शिखर पर चढ़ना कौन बड़ी बात थी! वहां पहले से बैठे हुए वर्धमान शिखर पर ऐसे शोभायमान हो रहे थे, जैसे मेरुपर्वत के शिखर पर सूर्य सुशोभित होता है। जब कि दूसरे राजकुमार डाली पर लटके हुए बंदर के समान दिखाई देते थे। बाद में वर्धमान ने खेल में ऐसी शर्त रखी कि जो कोई जीतेगा वह हारने वाले की पीठ पर चढ़ेगा। विजित वर्धमान राजकुमार भी घुड़सवार की तरह राजकुमारों की पीठ पर सवार हुए। क्रमशः महापराक्रमी विजयी वर्धमान देव की पीठ पर चढ़ बैठे। वह दुष्टबुद्धि देव पर्वतों को भी मात करने वाले विकराल वैताल का रूप बनाकर ऊँचा होने लगा, पाताल के सदृश मुंह बनाकर सर्प के समान जीभ दिखाने लगा। और उसके मस्तक रूपी पर्वत पर पीले और लंबे बाल दावानल के समान प्रतीत होने लगे। उसकी अतिभयंकर दाढ़े करवत के समान प्रतीत होने लगी। महाघोर पर्वत की गुफा के समान उसके नासा छिद्र दिखायी देने लगे। भृकुटि चढ़ाने से भयंकर भौंहे दो नागनियोंकी-सी मालूम होने लगी। इस तरह ताड़ के समान चढ़ता हुआ वह देव रुका नहीं; तब महाबली प्रभु ने उसकी पीठ पर मुक्का मारकर उसे बौना बना दिया। इस प्रकार इन्द्र के द्वारा वर्णित वर्द्धमान के धैर्य का प्रत्यक्ष अनुभव करके देव | अपने मूल स्वरूप में प्रकट हुआ और प्रभु को नमस्कार करके अपने स्थान पर वापिस लौट गया। . एक दिन वर्धमान महावीर के माता-पिता उन्हें विद्यारंभ-उत्सव करके पाठशाला भेजने की तैयारी कर रहे थे। इन्द्र ने यह जानकर विचार किया-क्या सर्वज्ञ को भी पाठशाला का विद्यार्थी बनना है?' यों सोचकर इन्द्र स्वयं वहाँ ब्राह्मण के रूप में आया और वर्धमान को उपाध्याय (अध्यापक) के आसन पर बिठाकर स्वयं नमस्कार करके उसने प्रभु से शब्दशास्त्र पर कुछ कहने की प्रार्थना की। वाग्मी एवं सर्वशास्त्रज्ञ महावीर ने व्याकरणशास्त्र पर विवेचन किया।
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy