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________________ शूली का सिंहासन, दीक्षा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक १०१ धर्महानि और पति पर विपत्ति के समय कुलीन नारियां कैसे जी सकती है?" इस ओर राज्यरक्षक पुरुषों ने सुदर्शन | को वध्यस्थान पर ले जाकर उसे शूली पर चढ़ा दिया। क्योंकि सेवकों के लिए राजाज्ञा भयंकर और अनुल्लंघ्य होती है। परंतु पलक मारते ही वहां शूली के स्थान पर स्वर्णकमलमय सिंहासन बन गया ! देवप्रभाव के आगे एक बार तो यमराज की दाढ़ भी कुंठित हो जाती है। फिर भी राजपुरुषों ने सुदर्शन का वध करने के लिए तीखी तलवार से दृढ़तापूर्वक | प्रहार किया। मगर तलवार गले पर लगते ही पुष्पमाला बन गयी। यह अद्भुत चमत्कार देखकर राजपुरुष दौड़े-दौड़े | राजा को यह खबर देने पहुंचे। उनके द्वारा सारी घटना सुनाते ही राजा फौरन हथिनी पर बैठकर घटनास्थल पर आये। | सुदर्शन को देखते ही राजा ने आलिंगन करके पश्चात्ताप पूर्वक कहा- मैं इसके लिए अत्यंत लज्जित हूं कि मुझ पापी ने आप पर झूठा दोषारोपण कर बदनाम किया। 'श्रेष्ठि ! आपका पुण्य बड़ा प्रबल था, इस कारण बाल भी बांका नहीं | हो सका। मैने ऐसा करके आपका बहुत बड़ा अहित किया । पर आपने तो अपना सज्जन का धर्म निभाया। मुझे क्षमा करें।' मायाविनी स्त्री पर विश्वास करके मैंने आपका वध करने का आदेश दे दिया था; इसलिए इस दधिवाहन के सिवाय | संसार में ऐसा कोई पापी नहीं है। दूसरी बात यह है कि मुझसे यह जो भयंकर पाप हुआ, उसका एक कारण यह भी | बना कि 'मैंने आपको इस विषय में बार-बार पूछा, लेकिन आपने बिलकुल उत्तर नहीं दिया। बताइए, मैं अल्पज्ञ इस पर से और क्या निर्णय करता?' अस्तु, कुछ भी हो, आप हाथी पर बैठिए ।' राजा ने सुदर्शन को हथिनी पर बिठाया | और वार्तालाप करते-करते अपने महल में ले गया। स्नान करवाया, वस्त्र आभूषण पहनाये और फिर एकांत में ले | जाकर रात को हुई घटना यथार्थ रूप से कहने का अनुरोध किया। सुदर्शन सेठ ने सारी घटना यथातथ्य रूप से सुनायी। | सुनते ही राजा को अभयारानी पर क्रोध चढ़ा और वह उसे सजा देने को तैयार हुआ । सुदर्शन ने फौरन राजा के चरणों | में गिरकर ऐसा करने से रोका। इस पर राजा ने अभयारानी को क्षमादान दिया। तत्पश्चात् न्यायरक्षक राजा ने सुदर्शन सेठ को हाथी पर बिठाकर नगर के बीचोबीच होते हुए सम्मानसहित गाजे-बाजे के साथ घर पहुंचाया। अभयारानी को सत्य घटना प्रकट हो जाने से अत्यंत खेद हुआ। उसने गले में फंदा डालकर आत्महत्या कर ली। 'परद्रोह करने वाले पापी का अपने आप ही पतन होता है।' पंडिता भी वहां से झटपट भागकर पाटलिपुत्रनगर में पहुंची और वहां देवदत्तागणिका के यहां रही। बात-बात में वह देवदत्ता के सामने सुदर्शन की प्रशंसा करती थी; इस | कारण देवदत्ता के मन में भी सुदर्शन के दर्शन की तीव्र उत्कंठा जागी । सुदर्शन ने संसार से विरक्त होकर मुनि दीक्षा अंगीकार कर ली । समुद्र जैसे रत्नाकर कहलाता है, वैसे ही गुणरत्नाकर गुरुदेव से आज्ञा लेकर तप से कृशतनु | सुदर्शनमुनि एकलविहारी प्रतिमा धारण करके ग्रामानुग्राम विहार करते हुए पाटलिपुत्र पहुंचे। जब वे भिक्षा के लिए नगर में घूम रहे थे, तभी अचानक पंडिता ने उन्हें देखकर भिक्षाग्रहण करने की प्रार्थना की। निःस्पृह और निर्लेप मुनि भी | लाभहानि का विचार किये बिना निर्दोष भिक्षा के लिए उसके यहां पहुंचे। देवदत्ता ने द्वार बंद कर दिया और पूरे दिन | उन्हें विचलित करने के लिए नाना प्रकार के प्रलोभन दिये । परंतु मुनि अपने महाव्रत से जरा भी नहीं डिगे। मुनि को दृढ़ जानकर देवदत्ता ने शाम को द्वार खोलकर उन्हें विदा किया। मुनि वहां से सीधे एक उद्यान में पहुंचे, जहां | अभयारानी मरकर व्यंतरी बनी हुई थी। सुदर्शनमुनि को देखते ही उसे पूर्वजन्म की घटना स्मरण हो आयी और वह | उस समभावी मुनि को विविध यातनाएँ देने लगीं। सचमुच, जीवों का ऋण और वैर जन्म-जन्मांतर तक नहीं मिटता । | व्यंतरी ने महासत्वशाली सुदर्शन को बहुत हैरान किया, लेकिन वह तो शुभध्यान के योग से अपूर्वकरण की स्थिति में पहुंच गये। क्रमशः क्षपकश्रेणि पर चढ़ते हुए वहीं उन्हें उज्ज्वल केवलज्ञान प्राप्त हो गया। तत्काल देवों और असुरों | ने वहां केवलज्ञान - महोत्सव मनाया। भवसागर में पड़े हुए जीवों के उद्धारक केवलज्ञानी सुदर्शनमुनि ने धर्मदेशना दी। महापुरुषों का अभ्युदय जनता के अभ्युदय के लिए होता है। उनकी धर्मदेशना से सिर्फ दूसरे जीव ही नहीं, देवदत्ता, | पंडिता और व्यंतरी (अभया) को भी प्रतिबोध हुआ । स्त्रियों के निकट रहने पर भी जिनकी आत्मा दूषित नहीं हुई, ऐसे | थे सुदर्शनमुनि ! अपनी शुभधर्मदेशना से अनेक जीवों को प्रतिबोध देकर उन्होंने क्रमशः परमपद प्राप्त किया। जिनेन्द्र | धर्मशासन को पाकर तदनुसार आराधना और शासन प्रीति रखने वाले व्यक्ति के लिए मुक्तिपद प्राप्त करना कठिन नहीं है । यह है सुदर्शनमुनि की कथा का हार्द ! ।। १०१ ।। 169
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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