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________________ अभया द्वारा दोषारोपण वध का आदेश योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक १०१ अनशन जारी रखूगा। सुदर्शन के निरुत्तर और निश्चेष्ट खड़े रहने से हतप्रभ व अपमानित बनी हुई कुटिल हृदया अभया ने निर्भय होकर भकुटि चलाते हुए कहा-अरे निर्लज्ज! मूखे, जड़ात्मा! क्या तूं मुझ सम्माननीय का अपमान करता है? याद रखना, नारी पुरुषों को सजा देने या पुरस्कार देने में समर्थ होती है। क्या तुम्हें यह पता नहीं है? कामदेव के अधीन मुझ कामातुरा द्वारा इतनी प्रार्थना करने पर भी अगर तुम मेरे वश में नहीं होओगे तो निःसंदेह, मैं तुम्हें देखते ही देखते यमराज का मेहमान बना दूंगी। इस प्रकार ज्यों-ज्यों अभया आवेश में आकर उग्र होती गयी, त्यों-त्यों महामना सुदर्शन धर्मध्यान की श्रेणी पर अधिकाधिक चढ़ते गये। यों करते-करते सारी रात बीत गयी। बारबार हैरान किये जाने पर भी सुदर्शन ध्यान से जरा भी चलायमान नहीं हुए। नौका के दंड से ताड़न करने पर क्या कभी महासमुद्र क्षुब्ध होता है? सबेरा होता देखकर अभया ने अपने नखों द्वारा अपने शरीर को नोंच डाला, अपने कपड़े फाड़ लिये और जोरजोर से चिल्लाने लगी-रे दौड़ो-दौड़ो! मुझे बचाओ, यह दुष्ट मुझ पर बलात्कार करना चाहता है। हल्ला सुनकर चौकीदार तुरंत महल में दौड़े आये। उन्होंने वहां कायोत्सर्ग में निश्चल खड़े सुदर्शन को देखा। चौकीदारों ने सोचा'हमारी समझ में नहीं आता। यह अनहोनी बात कैसे हो सकती है?' उन्होंने सीधे राजाजी के पास जाकर सारा हाल बयान किया। इस पर राजा अभया के पास आये। उसका बेहाल देखकर राजा ने पूछा तो अभया ने रोते-रोते कहानाथ! मैं आपकी आज्ञा से कल यहां रुक गयी थी। अचानक पिशाच के समान यह मेरे महल में घुस आया और मुझे देखते ही भूखे भेड़िये की तरह कामोन्मत्त होकर पहले तो इस कामव्यसनी पापी ने मधुर वचनों से मुझ से रति सहवास | करने की प्रार्थना की। इस पर मैंने इससे कहा-'सती कदापि असती के समान चेष्टा नहीं कर सकती। क्या चने की तरह कालीमिर्च चबाई जा सकती है? जब मैं इसके वश में नहीं हुई तो इसने मुझ पर बलात्कार करने की कोशिक की और मेरा ऐसा बुरा हाल कर दिया! इस पर मैं जोर से चिल्लायी। अबला के पास और बल ही कौन-सा है? राजा को भी सुनकर विश्वास नहीं हुआ कि सुदर्शन ऐसा कर सकता है? राजा ने वास्तविकता जानने की दृष्टि से सुदर्शन से इस विषय में बार-बार पूछा कि-'श्रेष्ठी! सच सच बताओ, बात क्या है?' परंतु राजा के द्वारा बार-बार पूछे जाने पर भी दयापरायण सुदर्शन ने रानी पर दया करने की दृष्टि से कुछ भी जबाव नहीं दिया। चंदन अत्यंत घिसे जाने पर भी दूसरे का ताप शांत करता है। सुदर्शन का बिलकुल मौन रहना पारदारिक चोर होने का लक्षण मानकर राजा ने क्रुद्ध होकर उसे गिरफ्तार करवाया और सारे नगर में उसके अपराध की घोषणा करवायी कि सुदर्शन घोर पापी है, अतः राजा ने इसका वध करने की आज्ञा दी है। राजाओं की कार्यसिद्धि वचन से और देवों की मन से होती है। राजाज्ञा होते ही राजपुरुषों ने पकड़कर सुदर्शन को गधे पर बिठाया। उसके मुंह पर काली श्याही पोत दी, उसके शरीर पर लालचंदन का लेप किया, मस्तक पर करवीर के फूलों की माला और गले में कंकोल की माला डाल दी। फिर सूप का छत्र धारण किये ढोल बजाते और गधे को नगर में घूमाते हुए सुदर्शन का जुलूस निकाल रहे थे। बीच-बीच में राजपुरुष चौराहों पर रुककर जोर से ढोल पीटकर घोषणा करते जाते थे कि-'इस पापात्मा ने राजा के अंतःपुर में भयंकर अपराध किया है, इसलिए इसका वध किया जाता है। राजा का इस संबंध में कोई कसूर नहीं है।' लोगों ने जब यह घोषणा सुनी तो वे भौंचक्के-से रह गये। सोचने लगे-'यह बात तो किसी भी तरह से मानने में नहीं आ सकती! लगता है, इसमें कोई षड्यंत्र हो। परंतु राजाज्ञा के आगे सभी निरुपाय थे। वैसे लोगों में हाहाकार मच गया। इस तरह नगर में घुमाते-घुमाते जब सुदर्शन को उसके घर के सामने लाया गया तो सती मनोरमा वह सारा दृश्य देखकर स्तब्ध हो गयी। उसने सोचा-मेरे पतिदेव सदाचारी हैं, यह बात मैंने कई बार उनमें देखी है। राजा भी इनके आचार पर प्रेम रखते थे। पर आज का यह दुर्दृश्य देखते हुए जान पड़ता है कि दैव (भाग्य) ही प्रतिकूल है। अवश्य ही पूर्वजन्म के किन्हीं अशुभकर्मों | का फल इन्हें प्राप्त हुआ है। इसके निवारण का अब सिवाय प्रभु प्रार्थना के और कोई उपाय नहीं है। कृतकों का फल | तो अवश्य भोगना पड़ता है। यों अंतर्मन में निश्चय करके कायोत्सर्गस्थ होकर जिनेश्वर देव की भक्ति में तल्लीन हो गयी। अंत में शासनाधिष्ठात्री देवी से विनति की-'भगवती! मेरे पति में कुशीलदोष की संभावना नहीं है। इसलिए इस परम | धर्मात्मा श्रावक की सहायता करोगें, तभी मैं कायोत्सर्ग पूर्ण करूंगी, अन्यथा मैं इसी स्थिति में अनशन करूंगी। 168
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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