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________________ मैथुन सेवन से जीवहिंसा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ७६ से ७९ |संतोष रूपी सुधारस से तृप्त गृहस्थ स्वर्ग प्राप्त करता है ।।५।। ___ अब परलोक और इस लोक में अब्रह्मचर्य का फल बतलाते हुए गृहस्थयोग्य ब्रह्मचर्यव्रत का निरूपण करते हैं।१३२। षण्ढत्वमिन्द्रियच्छेदं, वीक्ष्याब्रह्मफलं सुधीः । भवेत् स्वदारसन्तुष्टोऽन्यदारान् वा विवर्जयेत् ।।७६।। अर्थ :- समझदार गृहस्थ उपासक परलोक में नपुंसकता और इहलोक में राजा या सरकार आदि द्वारा इंद्रियच्छेदन आदि अब्रह्मचर्य के कड़वे फल देखकर या शास्त्रादि द्वारा जानकर परस्त्रियों का त्याग करें और अपनी स्त्री में संतोष रखे ॥७६।। व्याख्या :- यद्यपि अंगीकार किये हुए व्रत का पालन करते हुए गृहस्थ को इतना पाप संपर्क नहीं होता, फिर भी साधुधर्म के प्रति अनुरागी, साधुदीक्षा ग्रहण करने से पहले उपासक गृहस्थ जीवन में भी कामभोग से विरक्त होकर श्रावकधर्म का निरतिचार पालन करता है ।।६।। वैराग्य के शिखर पर पहुंचने के लिए अब्रह्मचर्य से निवृत्त होना जरूरी है। अतः अब अब्रह्मचर्यसेवन के दोष बताते हैं।१३३। रम्यमापातमात्रे यत्परिणामेऽतिदारुणम् । किम्पाकफलसङ्काशं, तत्कः सेवेत मैथुनम्? ॥७७।। अर्थ :- मैथुनसेवन प्रथम प्रारंभमात्र में बड़ा रमणीय और सुंदर लगता है, लेकिन उसका परिणाम किपाकफल के सदृश बहुत भयंकर है। ऐसी दशा में कौन उस मैथुन का सेवन करेगा? ||७७।। . .. व्याख्या :- किंपाकवृक्ष का फल वर्ण, गंध, रस और स्पर्श में बड़ा मनोहर, मधुर और सुगंधित लगता है, खाने में भी स्वादिष्ट होता है। मन को भी संतोष मिलता है; मगर खाने के बाद वह व्यक्ति जी भी नहीं सकता; कुछ ही | देर में वह प्राण ले लेता है। इसी प्रकार विषयसख सेवन करते समय बडे मनोहर हृदय को शांति देने वाले होते हैं.| लेकिन बाद में उनका परिणाम बहत ही भयंकर आता है। इसीलिए कहते हैं-अनेकदोषों का आश्रयभत जानकर कौन मैथुन का सेवन करेगा? ।।७७।।। अब मैथुनसेवन के भयंकर परिणामों का वर्णन करते हैं||१३४। कम्पः स्वेदः श्रमो मूर्छा, भ्रमिग्लानिर्बलक्षयः । राजयक्ष्मादि रोगाश्च, भवेयुमैथुनोत्थिताः ॥७८।। अर्थ :- मैथुन सेवन करने वाले के कंप, पसीना, थकान, मूर्छा, चक्कर, अंग टूटना, बल का नाश, राजयक्ष्मा (तपेदिक=क्षय), भगंदर, दमा, श्वासरोग आदि महारोग पैदा हो जाते हैं ।।८।। शेषव्रत भी जैसे अहिंसा में समाविष्ट हो जाते हैं, उसी तरह यह ब्रह्मचर्य भी है। इसलिए मैथन में अहिंसा का अभाव है, इसे कहते हैं।१३५। योनियन्त्रसमुत्पन्नाः, सुसूक्ष्मा जन्तुराशयः । पीड्यमाना विपद्यन्ते, यत्र तन्मैथुनं त्यजेत् ॥७९॥ अर्थ :- योनि रूपी यंत्र में अनेक सूक्ष्मतर जंतु उत्पन्न होते हैं। मैथुनसेवन करने से वे जंतु मर जाते हैं। इसलिए मैथुनसेवन का त्याग करना चाहिए ।।७।। ख्या :- प्राणी को जन्म देने का मार्ग या उत्पत्तिस्थान योनि कहलाता है। वह यंत्राकार होने से उसे योनियंत्र कहते हैं। उसमें स्वभावतः उत्पन्न होने वाले समच्छिम जीव इतने सूक्ष्म होते हैं कि आंखों से नहीं दिखायी देते। इसका स्पष्टीकरण करने के लिए दृष्टांत देते हैं-रूई से भरी हुई नली में तपी हुई लोहे की सलाई रूई को जला देती है; उसी तरह गर्म योनि में रूई के समान रहे हुए जीवसमूह पुरुषचिह्न के मर्दन से मैथुन करने पर नष्ट हो जाते हैं। इसलिए | मैथुनसेवन अनेक जीवों की हिंसा का जनक होने से त्याज्य समझना चाहिए। अन्य शास्त्रों में भी योनि में जंतुओं का होना बताया गया है। जैसे कि वात्स्यायन रचित कामशास्त्र में भी योनि में जंतुओं का अस्तित्व माना है। 'जन्तुसद्भाव इति वात्स्यायनोऽप्याह'-अर्थात् कामशास्त्ररचयिता वात्स्यायन ने भी कहा है कि योनि में जंतुओं का सद्भाव है। कहने का तात्पर्य यह है कि काम को प्रधानता देने वाले वात्स्यायन ने भी योनि में जंतुओं का होना स्वीकारकर लिया है, छिपाया नहीं; तब दूसरों का तो कहना ही क्या ।।७९।।। ___ अब इस विषय में वात्स्यायन द्वारा समर्थित श्लोक दे रहे हैं 148
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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