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________________ चोरी से निवृत्त होने का फल योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ७३ से ७५ हूं। परंतु तुम निश्चिंत और निःशंक होकर अपनी सारी आत्मकथा ज्यों की त्यों कह दो।' यह सुनकर लोहखुर-पुत्र | रोहिणेय ने कहा-राजन्! मेरे विषय में लोगों से आपने जो सुना है, वही मैं रोहिणेय चोर हूं। मैं निःशंक होकर नगर में चोरी करता था। जैसे नौका के जरिये नदी पार की जाती है, वैसे ही प्रभु के एक अमृत-वचन रूपी नौका से मैंने अभयकुमारजी की बुद्धि से उत्पन्न की हुई संकट की नदी पार कर ली। इस नगर में मैंने इतनी चोरियां की हैं, कि दूसरा कोई चोर मेरी छानबीन भी नहीं कर सकता। आप मेरे साथ किसी विश्वस्त व्यक्ति को भेजिए, ताकि मैं चुराई हुई सारी वस्तुएं उसे बता दूं और सौंप दूं। तत्पश्चात् दीक्षा ग्रहण करके अपना जन्म सफल करूं। मैं आप सबसे अपने अपराधों के लिए क्षमा चाहता हूं। श्रेणिक राजा की आज्ञा से अभयकुमार तथा कुछ प्रतिष्ठित नागरिक कुतूहलवश रोहिणेय के साथ गये। उसने पर्वत, नदी, वन, वृक्ष, श्मशान आदि जिन स्थानों में धन गाड़ा था, वह सब खोदकर निकाला और मार को सौंप दिया। अभयकमार ने भी जिस-जिस व्यक्ति का वह धन था. उसे दे दिया। निर्लोभी और नीतिमान मंत्रियों की और कोई दुर्नीति नहीं होती। उसके बाद श्रद्धालु रोहिणेय अपने संबंधियों के पास पहुंचा। संबंधियों को त्याग, वैराग्य और परमार्थ की बातें कहकर उसने प्रतिबोधित किया और फिर स्वयं भगवान् के चरणों में पहुंचा। श्रेणिक राजा ने खूब धूमधाम से रोहिणेय का दीक्षा-महोत्सव किया। ठीक समय पर शुभमुहर्त में उसने श्री महावीर प्रभु से भागवती दीक्षा अंगीकार की। दीक्षा लेने के बाद कर्मक्षय करने के लिए एक उपवास से लेकर छह महीने तक के उपवास आदि निर्मल तप रोहिणेय मुनि ने किये। तपस्या करते-करते जब शरीर कृश और अशक्त हो गया, तब भाव से संलेखना की आराधना करके श्री वीरप्रभु की आज्ञा लेकर विपुलाचल पर्वत पर पादपोपगमन नामक अनशन किया। अंतिम समय में शुभध्यान पूर्वक पंचपरमेष्ठी का स्मरण करते हुए रोहिणेय महामुनि ने समाधिमरण पूर्वक शरीर छोड़ा और देवलोक में पहुंचे। इसी प्रकार चौर्यकर्म से विमुख व्यक्ति रोहिणेय की तरह थोड़े ही समय में स्वर्ग सुख को प्राप्त कर लेता है। अतः बुद्धिमान पुरुष दोनों भवों को बिगाड़ने वाली चोरी हर्गिज न करें ।।७२।। अब चोरी से होने वाले दोषों के त्याग का निर्देश करते हैं।१२९। दूरे परस्य सर्वस्वमपहर्तुमुपक्रमः । उपाददीत नादत्तं तृणमात्रमपि क्वचित् ।।७३।। अर्थ :- दूसरे का धन आदि सर्वस्व हरण करने की बात तो दूर रही, परंतु दिये बिना एक तिनका भी नहीं लेना | चाहिए। उसके लिए प्रयत्न भी नहीं करना चाहिए ।।७३।। अब चोरी से निवृत्त होने का फल दो श्लोकों में बताते हैं।१३०। परार्थग्रहणे येषां, नियमः शुद्धचेतसाम् । अभ्यायान्ति श्रियस्तेषां स्वयमेव स्वयंवराः ॥७४।। अर्थ :- जो शुद्धचित्त मनुष्य दूसरे का धन हरण न करने का नियम ले लेता है, उनके पास संपत्तियां स्वयंवरा कन्या के समान स्वयं आती हैं; न कि दूसरे की प्रेरणा से; अथवा व्यापार-धंधे से प्राप्त होती हैं।।७४।। और भी देखिए।१३१। अनर्था दूरतो यान्ति, साधुवादः प्रवर्तते । स्वर्गसौख्यानि ढौकन्ते, स्फूटमस्तेयचारिणाम् ॥७५॥ अर्थ :- अस्तेयव्रत का आचरण करने वाले पर विपत्तियां आ जाने पर भी दूर चली जाती हैं। लोगों में अपनी प्रामाणिकता के लिए धन्यवाद मिलता है कि 'यह आदमी प्रामाणिक है।' इस लोक में उसकी प्रशंसा होती है, परलोक में भी वह स्वर्ग-सुख प्राप्त करता है ।।५।। व्याख्या :- प्रसंगानुसार यहां कुछ श्लोकों का अर्थ दिया जा रहा है अग्निशिखा का पान करना, सर्प का मुख चूमना और हलाहल विष का चाटना अच्छा, लेकिन दूसरे का धन हरण करना अच्छा नहीं है। दूसरे के धन में लोभवृत्ति रखने वाले की बुद्धि प्रायः निर्दयी हो जाती है। वह अपने भाई, पिता, चाचा, स्त्री, मित्र, पुत्र और गुरु तक को मारने के लिए उद्यत हो जाता है। दूध पीना चाहने वाली बिल्ली को मारने के लिए उठाये हुए डंडे के समान परधनहरण करने वाला अपना वध-बंधन टाल नहीं सकता। शिकारी, मच्छीमार, बिल्ली आदि से भी चोर बढ़कर है। क्योंकि राजा गिरफ्तार करता है, मगर चोर-मनुष्यों को ही अन्य जीवों को नहीं। | इसलिए बुद्धिमान मनुष्य अपने सामने पड़े हुए सोने, रत्न आदि पराये धन को भी पत्थर के समान समझे। इस तरह 147
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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