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________________ रोहिणेय की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ७२ | भगवान् के वे वचन याद आये। अगर भगवान् महावीर से सुने हुए देव स्वरूप से मिलता जुलता ही इनका स्वरूप होगा, तब तो मैं सारी बाते सच-सच कह दूंगा, अगर ऐसा न हुआ तो फिर कुछ बनाकर झूठी बात कह दूंगा। यों विचारकर चोर ने उनके पैर जमीन से स्पर्श करते हुए देखे, उनके नेत्रों की पलकें झपती हुई देखी, पुष्पमाला भी मुाई हुई नजर आयी, साथ ही उनके शरीर पर पसीना और मैल भी देखा। यह सब देखकर उसने सोचा-यह सब मायाजाल ही है। अतः वह उत्तर के लिए कुछ सोचने लगा। तभी दिव्यरूपधारियों ने उससे फिर कहा-देव! आप अपना पूर्व जीवन सुनाइए, हम सुनने के लिए उत्सुक है। रोहिणेय बोला-मैंने पूर्वजन्म में सुपात्रदान दिया था। अनेक तीर्थयात्राएँ की थीं। भगवान् और गुरु की सेवाभक्ति की थी। और भी अनेक धर्मकार्य किये। पहरेदार ने बीच में ही बात काटकर कहाअच्छा अब अपने दुष्कृत्यों का भी बयान कीजिए। रोहिणेय ने कहा-सतत साधुसमागम होने से मैंने अपने जीवन में कोई गलत काम नहीं किया। प्रतीहार ने कहा-जिंदगीभर मनुष्य एक सरीखे स्वभाव वाला नहीं रहता; इसलिए आपने अपने जीवन में चोरी. परदारासेवन आदि जो भी गलत काम किये हों. उन्हें प्रकट किजिए। रोहिणेय ने कहा-क्या ऐसा बुरा कर्म करने वाला कभी स्वर्ग प्राप्त कर सकता है? क्या अंधा आदमी पहाड़ पर चढ़ सकता है? वे सब उस चोर की बातें सुनकर चुप हो गये और अभयकुमार के पास जाकर आद्योपांत सारा विवरण कह सुनाया। सारा वृत्तांत सुनकर अभयकुमार ने राजा श्रेणिक से निवेदन किया-'महाराज! कई उपायों से हमने इसकी जांच की, परंतु इसका चोर होना साबित नहीं होता। कदाचित् चोर होगा भी; लेकिन जब कानून की गिरफ्त में न आये, तब तक हम इसे न्याय की दृष्टि से कैसे पकड़ सकते हैं? इसलिए न्यायनीति का पालन करते हुए हमें इसे छोड़ देना चाहिए। राजा की आज्ञा के अनुसार अभयकुमार ने रोहिणेय को छोड़ दिया। धूर्तता में दक्ष व्यक्ति से बड़े-बड़े होशियार आदमी भी ठगे जाते हैं।' अब रोहिणेय विचार करने लगा-पिताजी ने नाहक ही संतवाणी न सुनने की आज्ञा देकर चिरकाल तक मुझे भगवान् के वचनामृतों से वंचित रखा। अगर प्रभु के वचन मेरे कानों में नहीं पड़ते तो मैं कृत्रिम देवताओं के इस जाल को कैसे समझ पाता और कैसे इनके जाल से इतनी सफाई से छुटकारा पा सकता था? मैं तो अब तक इनकी मार खाकर खत्मकर दिया गया होता। अनिच्छा से भी सुने हुए वे भगवद्वचन रोगी के लिए संजीवनी औषधि की तरह मेरे लिये आज जिलाने वाले बन गये। धिक्कार है मुझे! मैंने अब तक अर्हन के वचनों को ठुकराकर चोरों के वचन ही माने, उन्हीं की बातों में आ गया, उन्हीं से ही प्रेम किया। सचमुच आम के पेड़ों को छोड़कर जैसे कौआ नीम के पेड़ों पर बैठने में आनंद मानता है, वैसे ही मैंने भगवान् के वचनों को छोड़कर पिताजी के वचनों में चिरकाल तक आनंद माना। फिर भगवान् के उपदेश का मैंने जरा-सा अंश सुना था, जिसका भी इतना सुफल मिला तो अगर मैं सारा उपदेश रुचि पूर्वक सुनता तो कितना लाभ मिलता?' इस प्रकार मन ही मन शुभ चिंतन करता हुआ रोहिणेय सीधा भगवान् महावीर के पास पहुंचा और उनके चरणकमलों में नमस्कार करके उसने प्रार्थना की-'भगवान! भयंकर आपत्ति रूपी जलचर जंतुओं से भरे हुए इस संसारसमुद्र में आपकी योजनगामिनी वाणी महायानपात्र (जहाज)| का काम करती है। अपने आपको प्रामाणिक पुरुष मानने वाले मेरे अनार्य पिता ने मुझे अब तक आपके वचन सुनने का निषेध किया था, इस कारण मैं अभागा आप जगद्गुरु की वाणी से वंचित रहा। त्रिलोकीनाथ! सचमुच वे पुरुष धन्य हैं, जो श्रद्धा पूर्वक अपने कांजलिपुट से आपके वचनामृत का सदा पान करते हैं। मैं अभागा कैसा पापी रहा कि आपके वचन सुनने की इच्छा न होने के कारण कानों में अंगुलियां डालकर बंद करके इस स्थान को पार करता था। एक बार अनिच्छा से भी मैंने कुछ वचन आपके सुने, उन मंत्राक्षरों के प्रभाव से ही मैं राजराक्षस के चंगुल से बच सका। नाथ! जिस प्रकार आपने मरते हुए की रक्षा की, उसी प्रकार आप अब संसारसागर के भंवरजाल में डूबते हुए मुझे बचाइए।' अनुकंपा परायण प्रभु ने उसकी नम्र प्रार्थना सुनकर उसे निर्वाणपददाता निर्मल साधुधर्म का उपदेश दिया। उससे प्रतिबोध पाकर रोहिणेय चोर ने नमस्कार करके प्रभ से सविनय पछा-भगवन! मैं मुनिधर्म के योग्य है या नहीं? कृपा करके फरमाइए।' भगवान ने कहा-'रोहिणेय! तुम योग्य हो!' यह सुनकर रोहिणेय ने कहा-प्रभो! तब तो मैं अवश्य ही महाव्रत अंगीकार करूंगा।' बीच में ही राजा श्रेणिक ने कहा-मझे इसे कछ कहना है। यों कहकर चोर से कहारोहिणेय! अब तो तुम प्रभुचरणों में दीक्षित होने जा रहे हो, इसलिए मैं तुम्हें अपने कृत दुष्कृत्यों के लिए क्षमा करता 146
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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