SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 163
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मूलदेव की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ७२ और फिर अपने चित्त के समान सत्कारपूर्वक विशाल राजमहल में उसे ले गया। अब देवदत्ता यहीं रहने लगी। देवदत्ता के साथ सुखोपभोग से मूलदेव के चांदी-से दिन और सोने-सी रातें कटने लगीं। इधर अर्थ और काम का धर्मयुक्त पालन करते हुए और जिनभक्ति करते हुए राजा सुखपूर्वक प्रजा पालन करते हुए राज्य करने लगा। __ इधर पारसकुल देश से खरीदने योग्य बहुत-सा माल लेकर जल परिपूर्ण मेघ के समान अचल सार्थवाह वापिस लौट रहा था। संयोगवश एक दिन वेणातट नगर पहुंचा। नगर में उसने अपना पड़ाव डाला और एक थाल में बहुमूल्य हीरे, पन्ने, माणिक, मोती, मूंगा, मणि, रत्न आदि भरकर विक्रमराजा को भेंट देने के लिए लाया। राजा ने अचल को देखते ही पहचान लिया। चतुर पुरुष किसी को देखते ही पूर्वजन्म के संबंध के स्मरण की तरह तुरंत उसे पहिचान लेता है। परंतु अचल मूलदेव को राजा के वेश में नहीं पहचान सका। सच है, वेष परिवर्तन करने पर एक नट को भी अल्पबुद्धि वाले नहीं पहचान पाते। कुशल प्रश्न के पश्चात् राजा ने सार्थवाह से पूछा- 'कहो जी! आप कहां से और किसलिए आये हैं? कौन हैं?' अपने साथ क्या-क्या माल लाये हैं?' उसने उत्तर में कहा-'राजन्! हम पारसकुल से आये हैं। कीमती माल बेचने के लिए परदेश से लाये हैं। आप, उसे देखने के लिए आज्ञा फरमा।' कौतुकवश राजा ने कहा-'अच्छा; मैं स्वयं देखने के लिए आऊंगा।' सार्थवाह बोला-यदि मेरी कुटिया पावन करेंगे तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। बड़े आदमियों के क्रोध और प्रसन्नता को कौन समझ सकता है? राजा सार्थवाह के साथ उसके डेरे पर आया। उसने भी मजीठ, कपड़ा, सूत आदि लाये हुए माल की जगात तय करने के लिए सारा माल खोलकर बताया। राजा ने माल देखकर पूछा-क्या इतना ही माल है?' हां, दीनदयाल! इतना ही है। सच-सच बताओ, अगर ज्यादा माल निकला तो तुम्हारी पूरी खबर ली जायेगी। सार्थवाह-मैं सच-सच कहता हूं कि इतना ही माल है।' राजा ने अपनी बात दोहराते हुए कहा- 'देखो, अच्छी तरह देखकर बताओ। हमारे राज्य में करचोरी करने वाले को भयंकर शारीरिक सजा दी जाती है।' अचल बोला-दीनानाथ! हम दूसरों के सामने भी असत्य नहीं बोलते तो आपके सामने कैसे बोल सकते हैं? यह सुनकर राजा ने अपने कराधिकारी से कहा-'इस सत्यवादी सार्थवाह से आधाकर लेना और इसके माल की अच्छी तरह तलाशी ले लेना। राजा के आदेश पर करदेय-वस्तुनिरीक्षक महाजनों ने बांस को लात मारकर उसे अंदर उतारकर तलाशी ली तो मामूली माल के बीच में छिपाये हुए कुछ कीमती माल की शंका हुई। शंका होने से वहां खड़े राजपुरुषों ने वहां चारों ओर रखे हुए किराने के स्थानों को झटपट टटोल लिया। उन्हें सार्थवाह के माल और धन दोनों पर शक हुआ। अधिकारी सदा दूसरों के दिल और नगर की तह तक पहुंच जाते हैं। अतः वे अधिकारी सार्थवाह पर कुपित हुये, उसे फटकारा और करचोरी का अपराध लगाकर उसे गिरफ्तार कर लिया। राजा के आदेश से सामंत भी गिरफ्तार कर लिये जाते हैं तो इस व्यापारी की क्या बिसात थी। राजपुरुषों ने उसे राजमहल में राजा के सामने प्रस्तुत किया तो राजा ने उसे बंधनमुक्त करा दिया। फिर राजा ने उसे महल में एक ओर ले जाकर पूछा'मुझे पहचानते हो, मैं कौन हूँ?' अचल ने कहा-'जगत् को प्रकाशित करने वाले सूर्य को और आपको कौन ऐसा मुर्खशिरोमणि होगा, जो नहीं पहचानता होगा?' चापलसी करना बंद कर सच-सच बताओ, तुम मझे जानते हो या नहीं? इस प्रकार राजा के कहने पर अचल ने कहा-'देव! मैं आपको नहीं जानता।' इस पर राजा ने देवदत्ता को बुलाकर उसे अचल को बताया। अपने ईष्टजनों को देखकर व्यक्ति खुद को कृतार्थ समझता है क्योंकि इससे अभिमानी लोगों को मन की शांति मिलती है। देवदत्ता को देखते ही अचल एकदम शर्मा गया और मन ही मन अत्यंत दुःख महसूस करने लगा कि एक स्त्री के सामने अपनी तौहीन होने की पीडा मत्य से भी बढकर दुःखदायी होती है। देवदत्ता ने अचल से कहा-'यह वही मूलदेव है, जिन्हें तुमने संकट में डाल दिया था और मुझे भी धर्मसंकट में डाल दिया था। देवयोग से आज तुम संकट में पड़े हो। इस समय तुम्हारे प्राण संकट में हैं। फिर भी आर्यपुत्र तुम्हें माफ करेंगे। ऐसे महापुरुष तुच्छ बातों पर ध्यान नहीं देते। न बदला लेने जैसी इतनी नीचता पर उतरते हैं। यह सुनकर तुरंत ही सार्थवाह ने राजा और देवदत्ता. दोनों के चरणों में पडकर कहा-'उस समय मेरे द्वारा किये गये तमाम अपराधों को आप क्षमा करें। उसी अपराध के सिलसिले में उज्जयिनी नरेश जितशत्रु मुझ पर कोपायमान है। वे भी आपके कहने पर मुझे उज्जयिनी में प्रवेश करने देंगे? मूलदेव ने कहा-'जब देवदत्ता ने तुम पर इतनी कृपा की है तो मैं भी तुम्हें क्षमा करता हूँ। उसके 141
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy