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________________ दर्शन- स्पष्टिकरण १ थी १७ श्लोक सुधीमां समाकितनुं तेना ६७ भेदना वर्णन पूर्वक विस्तारथी स्वरूप बताव्युं छे. बीजा प्रकाशना १८मा श्लोकथी ५३मा श्लोक सुधी श्रावकना पहेला स्थूल हिंसा-विरमण रूप प्रथम व्रतर्नु, ५४मा श्लोकथी ६४ सुधी स्थुलमृषावाद असत्य विरमण रूप बीजा व्रतनुं, ६५ थी ७५मां श्लोक सुधी स्थुल अदत्तादान-चोरी विरमणरूप त्रीजा व्रतर्नु, ७६ थी १०५ श्लोक सुधी स्थुल ब्रह्मचर्य व्रतनुं अने १०६ थी ११५ श्लोक सुधीमां परिग्रह परिमाण व्रतनुं विस्तुत स्वरूप आप्युं छे. अने ते ते व्रतोने अनुसरतां दरेक व्रतो उपरना सुविस्तृत कथानको पण आप्या छे... त्रीजा प्रकाशमां १ थी ३ श्लोक सुधी पहेला गुणवत-दिग् परिमाण व्रतनुं स्वरूप, ४ थी ७२ श्लोक सुधी भोगोपभोग परिमाण व्रत रूप बीजा गुणवतर्नु, ७३ थी ८१ श्लोक सुधी अनर्थदंडविरमण व्रत रूप त्रीजा गुणवतनुं विस्तृत | निरूपण द्वारा त्रण गुणव्रतनुं निरूपण कयुं छे. श्लोक ८२-८३मां सामायिक व्रतरूप प्रथम शिक्षाव्रतर्नु, ८४-८५ सुधीमां देशावकाशिक व्रतर्नु, ८६मा मां पौषध | व्रतर्नु, ८७-८८मा अतिथि संविभाग व्रतनुं विस्तृत स्वरूप बताव्युं छे. ८९मां श्लोकथी ११८ श्लोक सुधी १२ अणुव्रतना अतिचारोनुं स्वरूप बताववामां आव्युं छे. ११९ थी १५५ श्लोक सुधीमां श्रावकजीवनना समग्र कर्तव्योनुं वर्णन, सामायिक, चैत्यवंदन विगेरेमा आवता सूत्रोनो विशिष्ठ अर्थ पच्चखाण-गुरुवंदन अने देववंदन भाष्यनो संक्षेप, श्रावकनी दिनचर्या आदि विशिष्ठ करणीना सविस्तर निरूपणा द्वारा धर्म-धर्मीना भेद नयने आश्रयीने ज्ञानादि त्रण रत्नो जे मुक्तिना कारण रूप छे तेनुं निरूपण कर्यु आ रीतें भेदनयनी दृष्टिथी १ थी ३ प्रकाशमां धर्म अने धर्मी वच्चेनो भेद मानी आत्माना ज्ञानादि त्रण गुणोनो विचार करवामां आव्यो छे. चोथा प्रकाशमां धर्म अने धर्मीने अभेद मानीने विचार करवामां आव्यो छे. तेमां चार कषाय, लेश्याओगें स्वर अनित्यादि बार भावना अने मैत्र्यादि चार भावनानुं विस्तृत स्वरूप आपवामां आव्युं छे. पांचमां प्रकाशमां, प्राणायाम रेचक, कुंभक अने पुरक विगेरेना भेदोनुं वर्णन, वायुना भेदोनुं वर्णन अने स्वरूप, नाडी, स्वप्न, वगेरेनुं वर्णन आपवामां आव्युं छे. छट्ठा प्रकाशमां प्रत्याहार अने धारणानुं स्वरूप अने फळ बताव्युं छे. सात-आठ-नव अने दसमां प्रकाशमां अनुक्रमे पिण्डस्थ पदस्थ, रूपस्थ अने रुपातीत ध्यान- वर्णन अने स्वरूप विस्तृत रीते आपवामां आवेल छे. ११मा प्रकाशमां शुक्ल ध्यान- स्वरूप, तीर्थकर भगवानोना अतिशयो अने समुद्घात विगेरेनुं वर्णन आपवामां आव्युं छे. १२मां प्रकाशमां अनुभवसिद्ध तत्त्व, वर्णन करेल छे. अने तेमां विक्षिप्त, यातायात, संश्लिष्ट अने संलीन विगेरे ध्यानचं वर्णन करेल छे. आ रीते योगशास्त्रना बार प्रकाशमां विविध रीते योगनुं वर्णन करेल छे. योग अटले पद्मासनादि आसन जमावीने श्वासोश्वासनी प्रक्रिया करवी ते लोकप्रसिद्ध योगमां योगपरिर्प थतो नथी. परंत जेना द्वारा परमसखनिधान आत्यंतिक सख रूप मोक्षनी प्राप्तिमा जे कारण रूप बने छे ते योग छे. आवा योगना परिणामो चक्रवर्ति आरिसाभुवनमा रह्या छतां अनित्यतानी विचारणा द्वारा केवळज्ञान पाम्या. ब्राह्मण, स्त्री, बाळक अने गाय रूप महापातकना करनार दृढप्रहारी तेमज भयंकर दुष्कर्म करनार चिलाती पुत्र जेवा आ योगना प्रतापे केवळज्ञान पाम्या छे. टंकमां चित्तवत्तिने आत्मलक्षी बनाववाथी योगी योग द्वारा क्षिणोति योगः पापानि चिरकालार्जितान्यपि अनेक भवोना उपार्जन करेला पापोने क्षणमात्रमा योग बाळी मुके छे. आ योगशास्त्रनी रचना कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्रसूरि महाराजे| श्रुताम्भोघेरधिगम्य सम्प्रदायाच्च सद्गुरोः । vii
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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