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________________ हिंसक निंदनीय योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक १६ ६. विद्याप्रभावक - प्रज्ञप्ति, रोहिणी आदि विविध विद्यादेवियाँ सिद्ध करके तदधिष्ठित विद्याएँ प्राप्त करने वाला विद्याप्रभावक होता है। विद्याप्रभावक अपनी विद्या के प्रयोग द्वारा शासन पर आये हुए विविध उपसगों, कष्टों और आफतों को दूर करता है। ७. सिद्धि-प्रभावक - वैक्रिय आदि विविध लब्धियाँ तथा अणिमा आदि विविध सिद्धियाँ तथा अंजन, पादलेप आदि आकर्षक तंत्र प्रयोग जिसे प्राप्त हो और संघ की प्रभावना के लिए ही उनका प्रयोग करता हो, वह सिद्धिप्रभावक कहलाता है। ८. काव्य प्रभावक (कवि) - गद्य, पद्य आदि में विविध वर्णनात्मक प्रबंध या कविता आदि की रचना करके जनता को उस लेख, निबंध, कथा या कविता आदि के द्वारा धर्माचरण में प्रेरित; धर्म के प्रति प्रभावित करने वाला काव्यप्रभावक कहलाता है। प्रावचनिक आदि आठों प्रकार के प्रभावक अपनी शक्ति के अनुसार देश, काल आदि के अनुरूप जिनशासन के र-प्रसार में योगदान देकर प्रभावना करते हैं। इसलिए प्रभावना को सम्यग्दर्शन का द्वितीय भूषण रूप बताया ____३. भक्ति – संघ की सेवा (वैयावृत्य), विनय करना भक्ति है। साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका रूपी चतुर्विध धर्मसंघ (शासन) कहलाता है। संघ में प्रधान ईकाई साधु, साध्वी है। अतः अपने से ज्ञान और चारित्र से अधिक गुण वाले आये, तब खड़े होकर, सामने स्वागत के लिए जाकर, मस्तक पर अंजलि करके अथवा उन्हें आसन देकर उनका सत्कार करना, गुणाधिक चारित्रात्मा के आसन स्वीकारकर लेने पर स्वयं आसन ग्रहण करना, उनका बहुमान तथा उनकी उपासना करना, उनको वंदन करना, उनके पीछे-पीछे चलना; यों आठ प्रकार से उपचारविनय करना भक्ति है, जो आठ कर्मों को नष्ट करने वाली है। इसी प्रकार आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, नवदीक्षित साधु, रुग्ण, कुल, गुण, संघ, साधु, ज्ञानवान आदि संघस्थ व्यक्तियों की सेवा (वैयावृत्य) करना। वैयावृत्य के उत्कृष्ट पात्रों को आहार-पानी, वस्त्र, पात्र, उपाश्रय, पट्टे, चौकी, आसन (संस्तारक) आदि धर्म-साधन देना, उनकी औषध भैषज्य आदि द्वारा सेवा करना, कठिन मार्ग में उनका सहायक बनना। चतुर्विध संघ पर आये हुए विघ्नों या उपसर्गों का निवारण करना; ये सब प्रकार सेवाभक्ति के है। इनसे शासन की शोभा बढ़ती है, इसलिए भक्ति को सम्यक्त्व का तीसरा भूषण बताया है। ४. जिनशासन में कुशलता - धर्म के सिद्धांतों को समझाने तथा धार्मिकों पर आयी हुई उलझनों को सुलझाने, समस्या हल करने की कुशलता भी अनेक व्यक्तियों को धर्मसंघ में स्थिर रखती है, संघसेवा के लिए प्रेरित करती है। जैसे श्रेणिकपुत्र अभयकुमार की कुशलता से अनार्यदेशवासी आर्द्रक कुमार को प्रतिबोध मिला; वैसी ही कुशलता प्राप्त करनी चाहिए। ५. तीर्थसेवा - नदी आदि में सुखपूर्वक उतरने के लिए घाट (तीर्थ) होता है, वैसे ही संसार समुद्र से सुखपूर्वक पार उतरने के लिए तीर्थ (धर्म-संघ) होता है। यह तीर्थ दो प्रकार का होता है-जिस भूमि पर तीर्थंकरों का जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण हुआ हो, उस स्थान को लोक प्रचलित भाषा में 'तीर्थ' कहा जाता है; इसे जैन परिभाषा में द्रव्यतीर्थ कहते हैं। यह भी दर्शनीय होता है। और भावतीर्थ तो साधु, साध्वी श्रावक, श्राविका रूपी चतुर्विध श्रमणसंघ होता है। इसके माहात्म्य के संबंध में भगवान् महावीर और गणधर गौतम का एक संवाद मिलता है-गणधर गौतम ने पूछा-'भगवान्! तीर्थकर तीर्थ है अथवा तीर्थ तीर्थ है?' तब भगवान् ने उत्तर दिया- 'गौतम! तीर्थकर तो तीर्थ (स्वरूप) है ही, परंतु चार वर्ण (साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका) वाला श्रमणसंघ भी तीर्थ है।' इस दृष्टि से प्रथम गणधर आदि भी तीर्थ रूप है। [भग. ६८२] ऐसे तीर्थ की सेवा (पूर्वोक्त प्रकार से) करना तीर्थसेवा है, जो सम्यक्त्व की शोभा में चार चांद लगाने वाली है ।।१६।। इस प्रकार सम्यक्त्व के पांच भूषण बताकर अब 82
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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