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________________ सम्यक्त्व के पांच भूषण योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक १६ में सभी जीव सुख के अभिलाषी है, दुःख से वे दूर भागते है, इसलिए मुझे किसी को भी पीड़ा नहीं देनी चाहिए। उसको जैसा दुःख है, वैसा ही मुझे दुःख है, इस प्रकार की सहानुभूति रूप अनुकंपा से सम्यक्त्वी की पहचान हो जाती है। इसी प्रकार जिनेन्द्र-प्रवचनों में उपदिष्ट अतीन्द्रिय (इंद्रियपरोक्ष) वस्तु-जीव (आत्मा), कर्म, कर्मफल, परलोक, पुण्य, पाप आदि भाव अवश्य है, इस प्रकार का परिणाम हो तो समझा जा सकता है कि इस आत्मा में आस्तिक्य है। इस आस्तिक्य के कारण भी सम्यक्त्वी की पहचान हो सकती है ।।१५।। इस प्रकार पूर्वोक्त पांच चिह्नों से किसी आत्मा में सम्यग्दर्शन के होने का निश्चय किया जा सकता है। अब सम्यक्त्व के ५ भूषण बताते हैं।७२। स्थैर्य प्रभावना भक्तिः, कौशलं जिनशासने । तीर्थसेवा च पञ्चाऽस्य, भूषणानि प्रचक्षते ॥१६।। अर्थ :- १. जिनशासन (धर्मसंघ) में स्थिरता, २. उसकी प्रभावना (प्रचार-प्रसार), ३. भक्ति, ४. उसमें कुशलता ___ और ५. तीर्थसेवा। ये पांच उक्त सम्यक्त्व के भूषण (शोभावर्द्धक) कहे गये हैं ।।१६।। व्याख्या :- सम्यक्त्व के साथ जिनके जुड़ने से उसकी शोभा बढ़े, उसे सम्यक्त्वभूषण कहते हैं। ये जिन शासन | (धर्मसंघ) की शोभा बढ़ाने वाले भूषण पांच है १. जिनोक्त धर्म (संघ) में स्थिरता – किसी का मन आपत्ति, शंका आदि कारणों से धर्म से चलायमान हो रहा हो, कोई व्यक्ति धर्म से डिग रहा हो या पतित हो रहा हो, उसे समझा-बुझाकर उपदेश या प्रेरणा देकर धर्म में स्थिर करना अथवा अन्यसंप्रदायीय (दर्शनीय) ऋद्धि-समृद्धि, आडंबर या चमत्कार देखकर स्वयं भी जिनशासन के प्रति अस्थिर न होना स्थिरता है। २. धर्म (शासन) प्रभावना – जिसे जिनशासन नहीं प्राप्त हुआ, उसे विभिन्न प्रभावनाओं प्रचार-प्रसार के विभिन्न निमित्तों द्वारा शासन की ओर प्रभावित करना। प्रभावना करने वालों के ८ प्रकार है-प्रावचनिक, धर्मकथाकार, वादी, नैमित्तिक, तपस्वी, विद्यावान, सिद्धिप्राप्त और कवि। (व्य. भा.) १. प्रावचनिक या प्रवचन-प्रभावक - जो द्वादशांगी रूपी प्रवचनों या गणिपिटकों के अतिशय ज्ञान द्वारा युगप्रधान शैली में जनता को प्रभावित करता है, जनता में आगमज्ञान के प्रति प्रकर्ष भावना पैदा करता है। अपने यगलक्षी प्रवचनों से जनजीवन को धर्माचरण के लिए प्रेरित करता है, वह प्रवचन-प्रभावक कहलाता है। २. धर्मकथा-प्रभावक - जो विविध युक्ति, दृष्टांत आदि के द्वारा जनता को सुंदर धर्मोपदेश देने की शक्ति रखता हो और जनता को धर्मकथा से प्रभावित करके धर्मबोध देता हो, वह धर्मकथा प्रभावक कहलाता है। ३. वाद-प्रभावक - जो वादी, प्रतिवादी, सभ्य और सभापति-रूप चतुरंगिणी सभा में प्रतिपक्ष की युक्तियों का खंडन करके स्वपक्ष की स्थापना करने में समर्थ हो। इस प्रकार अपनी वाद (तर्क) शक्ति से लोगों को प्रभावित करता हो, उसे वादप्रभावक कहते हैं। ४. निमित्त-प्रभावक - जो भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों काल-संबंधी लाभालाभ का विज्ञ हो तथा निमित्तशास्त्रज्ञ हो; और अपने उक्त ज्ञान से जनता को उसके भूत, भविष्य एवं वर्तमान के जीवन से धर्मबोध देकर धर्मसाधना की ओर आकर्षित करता हो, वह निमित्त-प्रभावक होता है। ५. तपस्या-प्रभावक (तपस्वी) - अट्ठम आदि विविध कठोर तपस्या करके जनता को आत्मशक्ति का परिचय देने तथा तपस्या करके आत्मशुद्धि द्वारा आत्मशक्ति प्रकट करने के लिए प्रभावित करने वाला तपस्या-प्रभावक होता है। | 1. स्व प्रशंसा के लिए निमित्त एवं मंत्र-विद्या का प्रयोग करने वाला धर्म प्रभावक नहीं परंतु धर्म विध्वंसक है। 81
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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