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________________ 42 श्राद्धविधि प्रकरणम् जो उपमायुक्त कहा जाता है इसे उपमासत्य कहते हैं। व्यवहार सत्य इतने प्रकार के हैं इसलिए व्यवहार में व्यवहार सत्य के ही अनुसार चलना चाहिए। चतुर शुकराज केवली भगवंत के ये वचन सुनकर अपने मातापिता को 'पिता, माता' इस तरह प्रकटरूप से बोलने लगा जिससे सब लोगों को संतोष हुआ। तदनन्तर मृगध्वज राजा ने पूछा कि, 'हे महाराज! युवावस्था में ही आपको ऐसा वैराग्य प्राप्त हुआ, अतः आपको धन्य है। क्या मुझे भी किसी समय ऐसा वैराग्य होगा? केवली भगवान् ने उत्तर दिया, 'हे राजन्! तेरी चन्द्रवती नामक रानी के पुत्र का मुंह देखते ही तुझे दृढ़ वैराग्य प्राप्त होगा।' केवली भगवंत के वचनों को सत्य मानकर राजा उनको वन्दनाकर हर्षपूर्वक सपरिवार अपने महल में आया। अपनी सौम्यदृष्टि से मानों अमृतवृष्टि करता हो ऐसा शुकराजजब दश वर्षका हुआ तब रानी कमलमाला को दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ। रानी के पूर्व स्वप्न के अनुसार उसका नाम 'हंसराज' रखा गया। शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की तरह अपनी रूपादिक समृद्धि के साथ वह दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। साथ ही राम लक्ष्मण की तरह शुकराज व हंसराज दोनों प्रेमपूर्वक साथ-साथ खेलने लगे। तथा जैसे काम और अर्थ दोनों धर्म की सेवा करते हैं इस तरह पिता की सेवा करने लगे। एक दिन राजा मृगध्वज सभा में बैठे थे कि द्वारपाल ने आकर तीन शिष्यों के साथ गांगलि ऋषि के आने की सूचना दी और आज्ञा पाकर उन्हें अन्दर लाया। राजा ने ऋषि को योग्य आसन देकर कुशल-क्षेमादि पूछा, ऋषि ने भी यथाविधि क्षेम कुशल पूछकर आशीर्वाद दिया। पश्चात् राजा ने विमलाचल तथा ऋषि के आश्रम का समाचार पूछकर प्रश्न किया कि, 'यहां आपका आगमन किस हेतु से और किस प्रकार हुआ है?' तब ऋषि ने कमलमाला को पड़दे के अंदर बुलवाकर कहा कि, 'आज गौमुख नामक यक्ष स्वप्न में आकर मुझे कहने लगा कि, 'मैं विमलाचल तीर्थ को जानेवाला हूं।' मैंने यक्ष से पूछा, 'इस तीर्थ की रक्षा कौन करेगा?' उसने उत्तर दिया कि, 'हे गांगलि ऋषि! तेरी पुत्री कमलमाला को भीम और अर्जुन के समान लोकोत्तर चरित्रधारी शुकराज व हंसराज नामक दो पुत्र हैं, उनमें से किसी एक को तू यहां ले आ उनके अपरिमित माहात्म्य से इस तीर्थ में कोई उपद्रव नहीं होगा।' मैंने कहा, 'क्षितिप्रतिष्ठित नगर तो यहां से बहुत दूर है, मैं किस प्रकार जाऊं व उन्हें लेकर किस प्रकार आऊ?' मेरे इस प्रश्न पर यक्ष ने कहा कि, 'यद्यपि क्षितिप्रतिष्ठित नगर यहां से बहुत दूर है तथापि मेरे प्रभाव से समीप की तरह दुपहर के पहिले ही तू जाकर आ जायेगा।' इतना कहकर यक्ष अदृश्य हो गया। प्रातःकाल होते ही मैं जागृत हुआ और वहां से विदा होकर शीघ्र ही यहां आया। देवता के प्रभाव से क्या नहीं हो सकता है? हे राजन्! दक्षिणा के रूप में दोनों में से एक पुत्र शीघ्र मुझे दे, ताकि बिना प्रयास प्रभात के ठंडे समय में ही आश्रम को चला जाऊं।' ऋषि के वचन सुनकर महा पराक्रमी, उत्कृष्ट कान्तिवान बालक हंसराज ने हंस
SR No.002285
Book TitleShraddhvidhi Prakaranam Bhashantar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherJayanandvijay
Publication Year2005
Total Pages400
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual, & Vidhi
File Size8 MB
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