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________________ गणपाठ के प्रवक्ता और व्याख्याता १६९ नामपारायण का साक्षात् निर्देश काशिका के आद्य श्लोक में उपलब्ध होता है, और नामपारायण से संबद्ध पारायणिकों का निर्देश काशिका ८।३।४८ में मिलता है । पदमञ्जरी (२।४।६१) भाग १, पृष्ठ ४८७ पर लिखा है-परिशिष्टा: पारायणे द्रष्टव्याः । २४. रत्नमति रत्नमति का गणपाठ सम्बन्धी मत वर्धमान की गणरत्नमहोदधि में मिलता है। यथा १-रत्नमतिस्तु कालशब्दस्य संज्ञावाचिनो ङी। पृष्ठ ४६ । २ - रत्नमतिना तु हरितादयो गणसमाप्ति यावत् व्याख्यातम् । तन्मतानुसारिणा मयाप्येते किल निबद्धाः। पृष्ठ १५२ । इन उदाहरणों से रत्नमति का गणपाठ-व्याख्यातृत्व स्पष्ट है । रत्नमति के धातुपाठ विषयक कतिपय मत माधवीया धातुवृत्ति प्रादि में उपलब्ध होते हैं । उज्ज्वलदत्त ने भी उणादिवृत्ति १।१५१ में रत्नमति का एक उद्धरण दिया है-पुष्वा जलकणिकेति रत्नमतिः। __रत्नमति का उल्लेख हैमबृहन्न्यास १।४।३६; २।११६६ प्रभृति में भी मिलता है। --- २५. वसुक्र वर्धमान ने महरादिपत्यादि गणस्थ उषर्बुध शब्द का व्याख्यान करते हुए लिखा है उषर्भुद श्रीवसुक्रः।' पृष्ठ २६ । इससे वसुक्र का गणपाठ-व्याख्यातृत्व द्योतित होता है । इसके विषय में इससे अधिक हम कुछ नहीं जानते। ___ २० . १. कलकत्ता मुद्रित संस्करण, पृष्ठ ५५ पर 'रत्नामति' पाठ छपा है। वह अशुद्ध है ।
SR No.002283
Book TitleSanskrit Vyakaran Shastra ka Itihas 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYudhishthir Mimansak
PublisherYudhishthir Mimansak
Publication Year1985
Total Pages522
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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