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________________ अध्यात्ममतपरीदा. २७३ ॥श्रीवीतरागाय नमः॥ - ॥ अथ श्रीयशोविजयजी उपाध्यायकृत अध्यात्ममतपरीक्षाप्रारंनः॥ ॥आर्या वृत्तं॥पणमिय पासजिणंदं, वंदिअ सिरिविजयदेवसू रिंदं ॥अप्पमयपरिकं, जहबोदमिमं करिस्सामि ॥ १ ॥ व्याख्याः- सर्व कल्याणनी सिधिने अर्थे, श्रीपार्श्वनाथने प्रणाम करीने, तथा संप्रति विजयमान तपागजाधिराज जे श्रीविजयदेवसूरी तेमनी वंदना करीने, पो ताना बोधने अनुसारे, आ अध्यात्ममतपरीक्षानामनुं प्रकरण ढुं करूं बुं. उपोद्घातः- कोई आशंका करे के, गुरू तत्वनो जे अंगीकार तेने अध्यात्म कहे. तेमां कोई विवाद नथी: त्यारे परीक्षा ते शानी करवी ? जे वस्तुमा संदेह पमे तेनी परीक्षा कराय जे; निस्संदेह वस्तुनी शी परीदा ! माटे या अध्यात्ममत | परीदानामनुं प्रकरण करवानुं कांई प्रयोजन दीवामां आवतुं नथी. तेने कहे ॥१॥ असप्पं णामाई, चनविदं चनविदा य तवंता ॥ तब श्मे अनुत्रिय, पामेणशप्पिा आ॥ ॥ व्याख्याः- अध्यात्मना चार प्रकार ले. एक नामअध्यात्म, बीजो स्थापनाथ ध्यात्म, त्रीजो इव्यअध्यात्म अने चोथो नावअध्यात्म. चेतन तथा अचेतन ए बेमांनी कोई पण वस्तुनुं अध्यात्म एवं नाम राखेबुं होय ते नामअध्यात्म; अ ध्यात्मवंत यतिना आकार- चित्र कहाडयूं होय ते स्थापनाअध्यात्म ; अने जेथ की नावअध्यात्म उत्पन्न थाय, जेवां के, प्रतिमादर्शन, सजुरुसेवा, अने अध्या त्मशास्त्रान्यास ए त्रणे नावाध्यात्मना कारण ने, माटे ते इव्याध्यात्म; तथा आ माना जे शुभ परिणामते नाव अध्यात्म कहिये. तेम अध्यात्मीना पण पूर्वोक्त रीते चार प्रकार के तेश्रोमांइहां जेओना मतनो विचार कर्त्तव्य जे, ते नामअध्यात्म वंत बे. तेथोना मतनी आशंकानुं निवारण करवू, ते आ ग्रंथनुं प्रयोजन ॥२॥ उ:-पूर्वोक्त चार प्रकारना अध्यात्ममानो नावअध्यात्म मोदनुं कारण . माटे तेनुं विशेषेकरी स्वरूप कहेजेः जा खलु सहावसिक्षा, किरिआ अप्पाणमेव अदिगिव ॥ नाश् परमशप्पं, सा दंसा नाण चरणमा ॥३॥ व्या:- जहांशुधी कषाय तथा इंडियने वश थयोथको संसारनेविष आत्मा ३५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002166
Book TitlePrakarana Ratnakar Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhimsinh Manek Shravak Mumbai
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1876
Total Pages364
LanguageHindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size11 MB
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