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________________ आस्तिक नास्तिक संवाद. २७३ म जाणवू नही. बागला नवनी वात तो रही, पण या नवमांज मद्यादिक पदा र्थना योगे, गया दिवसनी वात पूबवाथी माणस बराबर कही शकतो नथी जु ओ के, कोई मनुष्य ताडनादिकना योगे मूर्जावान थयो होय, कोई पुरुषे सुरापान कडे होय, अथवा निावश थयो होय, त्यारे गया दिवसनी स्मृति रहेती नथी; तेनुं कारण मद्यादिक पदार्थोनुं आवरण ले तेम जीवने ज्ञानावरणी कर्मना उदयथी पूर्व नवना वातनी स्मति थती नथी. वली जेम था नवमांज माताना न दरमां नाना प्रकारना कुःख सहन करेला होय, ते वात जन्म्यापली कांई कही शक तो नथी: तो नवांतरनी वात केम कही शके ? माटे नवांतरनी वात तो विशेष ज्ञा नीविना बीजो कोई जाणी शकेज नही, एम समजवु. दोहा, झानावरणी कर्मथीन वविस्मृति थइ जाय: विशेष ज्ञानी कहि शके, पूर्व जन्म महिमाय ६ ___ए नास्तिकः-अनिमानयुक्त मुज्ञ करीने बोले बे-तमे एम मानो बो, के जीवने कर्मनो लेप लागे .ने वली एम पण कहो बो के, जीव वास्तविक स्वरूपे गुम . त्यारे जे गुम होय तेने लेप केम लागे? माटे जीव गुज डेतेने कोई कर्मनो लेप लागतो नयी एम मानवं जोश्ये. वास्तिकः-ट्रंकामांज समाधान करने के, यद्यपि जीवन वास्तविक स्वरूप गुच बे, तथापि युनायुन कर्मने योगे तेने लेप लागे जे; तेथीज जीव बंध कहेवाय डे अने जेने कर्मनो लेप नथी, ते मुक्त कहेवाय जे. मुक्ति तो सिमता पाम्याविना संन वेनही अने जहांसुधी मुक्तिनो अनाव डे, तहांसुधी बंधनी कल्पना अवश्य कर वी जोश्ये. ते बंध जीवने अनादि कालथी चाल्यो आवे जे. जेम धानने तूस ला गेलाज होय बे तेम जीवने कर्म अने कर्मजन्य शरीर लागेलुंज होय . जेम धा नने तूस लागवानुं कारण बोतरां होय . तेम जीवने कर्मबंध जागवान का रण मिथ्यात्व तथा रागवेषादिक होय जे. जेम धान्यमांथी तूस तथा तत्संबंधी बो तरांरूप बंध हेतु पदार्थना अनावथी शुरू करा देखाय : तेम जीवमांथी मि थ्यात्व तथा राग देषादिक कर्मबंध हेतुनो अनाव थयाथी शुक्ष निर्मल थाय बे. जेम अनाजनो शुद्ध थयनुं दाणुं उगे नही. तेम जीवपण शुक्ष निर्मल थया यो जन्ममरण पामे नही. दोहा, कर्म लेपना योगथी, बंध जीवने होय; कर्म खपे मुक्ती लहे, जन्म मरण नहि कोय. ७ १० नास्तिकः-संमा विचारमा पडेला जेवी मुशथी बोलवा लागे ने.कर्म पोते तो जड पदार्थ जे. तेश्रोनो जीवनी साथे स्वतंत्र संबंध संनवे नही. कोई पण प्रेरक होवो | Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.002166
Book TitlePrakarana Ratnakar Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhimsinh Manek Shravak Mumbai
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1876
Total Pages364
LanguageHindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size11 MB
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