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________________ ७० . जैनमेघदूतम् में लिप्त कृष्ण की आठों पत्नियों ने उचित स्थान पर खड़े होकर भगवान् को उसी प्रकार से घेरलिया जैसे द्वेषजनित भोगाकांक्षा एवं सुख की इच्छाओं के कारण आठ प्रकार की कर्म प्रकृति आत्मा को घेर लेती है ॥६॥ [यहाँ जेनों द्वारा मान्य आठ मूल कर्मप्रकृतियों की तुलना कृष्ण की आठ पटरानियों से की गई है] आचख्यावित्यथ सविनयं भीष्मजा राजदन्तज्योत्स्नाव्याजान्मलयजरसः स्वामिनं सिञ्चती तम् । विश्वेवास्मान् सहसि भगवन्नु श्यसे तद्विशङ्क स्त्री गङ गेवाधिवसति शिरो मानिताऽपीश्वरस्य ॥७॥ आचल्यावि . हे मेघ ! अथ परिवेष्टनान्तरं भीष्मजा रुक्मिणी सविनयं यथा स्यात् तथा आचस्यो इति अकथयत् । भीष्मजा किं कुर्वती-राजदन्तज्योत्स्नाव्याजात् मुख्य-दन्तचतुष्कमिषात् मलयजरसैः चन्दनद्रवः तं स्वामिनं सिञ्चती इतीति कि-भो भगवन् ! श्रीनेमे त्वं विश्वा इव वसुन्धरा इव अस्मान् सहसि क्षमसे, तत् तस्मात्कारणात् अस्माभिः विशवं निःशङ्कं यथा स्यात् तथा त्वं उश्यसे जल्पसे । हे देवर ! स्त्री मानिता सती ईश्वरस्यापि राज्ञोऽपि शिरो मस्तकं अधिवसति चटतीत्यर्थः । क इव गङ्गव, यथा गङ्गा जह नुकन्या मानिता सती ईश्वरस्यापि शिवस्यापि शिरः अधिवसतिस्म ॥ ७ ॥ रुक्मिणी चन्दन रस से उन स्वामी नेमिनाथ को सिंचती हुई मुस्कराहट के बहाने विनयपूर्वक श्री नेमिनाथ से इस प्रकार बोली-हे नाथ आप हमारी बातों को पृथ्वी की तरह सहन करते हैं तभी तो हम निसंकोच बातें कर लेती हैं। कहा भी गया है कि सम्मानित स्त्री गङ्गा की तरह शङ्कर के शिर पर शोभित होती है अर्थात् उच्चस्थान प्राप्त करती है।।७।। रूपं कामस्तव निशमयन् वीडितोऽभूदनङ्गो लावण्यं चाबिभ ऋभुविभुलॊचनानां सहस्रम् । तारुण्यश्रीव्यंशिषदथ ते पुष्पदन्तौ शरदन्नेताऽरण्यप्रसवसमतां त्वं विना स्त्रीरमूनि ॥८॥ रूपं कामस्तव • हे देवर ! कामः कन्दर्पः तव रूपं निशमयन् विलोकयन् बडितः लज्जितः सन् अनङ्गः अभूत् अशरीरी बभूव । च पुनः ऋभुविभुः इन्द्रः Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002122
Book TitleJain Meghdutam
Original Sutra AuthorMantungsuri
Author
PublisherParshwanath Shodhpith Varanasi
Publication Year1989
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size15 MB
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