SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 57
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गाथासप्तशती "तेरा गर्व बढ़े और जो कि तू झगड़े की बात करती है पर सचमुच तेरे बिना नींद नहीं आती ( मुझे भी सेज पर ) जगह दे ।" झगड़े की बात की अपेक्षा सम्बन्ध विच्छेद की बातों से दूरी बढ़ना अधिक संभव है । झगड़े तो प्रायः परिवार में होते ही रहते हैं । अतः 'विहंडणं' का अर्थ 'विभण्डनं ' ( विशेष झगड़ा करने वाला ) न करके 'विखण्डनं' ( विशेष रूप से सम्बन्धविच्छेद करने वाला ) करना अधिक उपयुक्त है । वचन का यह विशेषण 'विभण्डनं' की अपेक्षा गर्ववृद्धि के अधिक अनुकूल है । नायिका सोच सकती है कि मैं सम्बन्ध तोड़ने की बात करती हूँ तब भी यह मेरा पीछा नहीं छोड़ता । अतः उसका गवं बढ़ना स्वाभाविक है । शेष अनुवाद ठीक ही है । ६१ - कअविच्छेओ सहिभंगिभणिअसम्भाविआवराहाए । ५२ झाड आपल्लवइ पुणो णअणकवोलेसु कोवतह ॥ ९०७॥ कृतविच्छेद: सखीभङ्गिभणितसम्भावितापराधायाः । झटिति आपल्लवति पुनर्नयनकपोलयोः कोपतरुः ॥ "सखी की लटपट बातों से तेरा अपराध मानकर उसका विच्छेद किया हुआ भी कोपतरु फिर नेत्र और कपोलों में तुरत पल्लवित हो गया ।" 'सम्भाविवराहाए' का अर्थ 'संभावितापराधायाः' नहीं है । उक्त पद की संस्कृतच्छाया 'सद्भावितापराधायाः ' है । सम्भावित अपराध प्रचण्ड कोप का नहीं, हल्के मान का ही हेतु हो सकता है । गाथा नायिका के उत्कट कोप का वर्णन करती है, जिसके लिये वास्तविक एवं सत्य अपराध की अपेक्षा है । 'सहिभं गभणिअसम्भाविआवराहा' का अर्थ है - सखी के वक्रवचन विन्यास से जिसने ( नायक के ) अपराध की सत्यता का निश्चय कर लिया है । ( सहीए आलीए भगि भणिण कवअणविण्णासेण सब्भाविओ सच्चत्तणेण णिच्छिओ अवराहो जीए । ) गाथा का अर्थ यह है : सखी के वक्रवचनविन्यास से जिसने ( नायक के ) अपराध की सत्यता का निश्चय कर लिया था, उस नायिका का कटा हुआ कोपरूपी वृक्ष भी नयनों और कपोलों में पुन: पूर्णतः पल्लवित हो गया । ( अर्थात् उसके नयन और कपोल आरक्त हो गये । ) रूपक पुरस्कृत पल्लवित शब्द पल्लवनिष्ठ लोहित्य का व्यंजक है । उससे नयनों और कपोलों के आरक्त हो जाने की सूचना मिलती है । ६२ - हिअए रोसुक्खित्तं पाअपहारं सिरेण पत्थंतो । ण हओ दइओ माणसिणीए, थोरंसुअं रुण्णं ॥ ११० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002116
Book TitleGathasaptashati
Original Sutra AuthorMahakavihal
Author
PublisherParshwanath Shodhpith Varanasi
Publication Year1995
Total Pages244
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy