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________________ -५.१७६ ] पञ्चमो विभागः १७१ गुहाद्याश्रिता मर्त्याः शैत्यगन्धगुणाहृताः । विनिर्गत्य ततः सर्वे मेदिनीमावसन्ति च ॥ भूमिमूलफलाहारा वर्धमानफलोदयाः । बहुला लघु जायन्ते धान्यानि च ततः परम् ॥ समासहस्रशेषे च दुःषमाया विवर्धने । भवन्ति कुलकृन्मयस्ततः पञ्चदश क्रमात् ।। १७३ उक्तं च त्रिलोकसारे [८७१-७२]-- १७२ उस्सप्पिणीय विदिये सहस्स सेसेसु कुलयरा कणय । कणयप्पहरायद्वयपुंगव तह नलिणपउममहपउमा ॥ तस्सोसलमणुहि 'कुलायाराणलपक्क पहुदिया होंति । तेवद्विणरा तदिये सेणियचरपढमतित्थयरो ॥ ततः प्रभृति सर्वज्ञा बलकेशवचक्रिणः । प्रतिशत्रुनृपाश्चैव भवन्ति क्रमशो भुवि ॥ १७४ अनीतिः स्थितमर्यादी गुणवन्नरमण्डितः । सुभिक्षो धर्मकर्मादयस्तृतीयोऽप्यतिवर्तते ॥ १७५ ततस्तु भवेत्तत्र सुषमा पञ्चमी समा । द्विरुक्तसुषमा षष्ठी युत्सर्पिण्यामिति स्मृताः ॥ १७६ इति लोकविभागे कालविभागो नाम पञ्चमप्रकरणं समाप्तम् । लतायें एवं वृक्ष उत्पन्न होने लगते हैं ।। १७० ॥ जो मनुष्य पहिले गुफाओं और नदियों के हुए थे वे सब अब शीतल गन्ध गुणको ग्रहण करते हुए वहाँसे निकलकर पृथिवीपर आ वसते हैं ।। १७१ ।। उस समय भूमि बढ़नेवाली फलोंकी उत्पत्तिसे संयुक्त हो जाती है । मनुष्य और तिर्यंच भूमि (मिट्टी), मूल और फलोंका आहार किया करते हैं। तत्पश्चात् पृथिवी के ऊपर धान्य (गेहूं व चना आदि ) शीघ्र ही उत्पन्न होने लगता है ।। १७२ ।। उत्सर्पिणी कालमें दुःषमाके एक हजार वर्ष शेष रह जानेपर क्रमसे पन्द्रह कुलकर पुरुष उत्पन्न होते हैं ।। १७३ ।। त्रिलोकसारमें कहा भी है www.do [ १०१ ; उत्सर्पिणी द्वितीय (दुःषमा ) कालमें एक हजार वर्ष शेष रह जानेपर ये कुलकर उत्पन्न होते हैं कनक, कनकप्रभ, कनकराय, कनकध्वज, कनकपुंगव इसी प्रकारसे नलिन, नलिनप्रभ, नलिनराय, नलिनध्वज, नलिनपुंगव, पद्म, पदम्प्रभ, पदम्ाय, पदमध्वज, पदम्पुंगव और महापद्म ।। १६ ।। उन सोलह कुलकरोंके द्वारा कुलाचार और अग्निसे भोजन पकाने आदिका प्रारम्भ होने लगता है । इसी उत्सर्पिणीके तृतीय कालमें तिरेसठ (६३) शलाकपुरुष उत्पन्न होते हैं । इनमें प्रथम तीर्थंकर भूतपूर्व श्रेणिक राजाका जीव होगा ॥ १७ ॥ उन कुलकरोंको आदि लेकर इस पृथिवीपर क्रमसे सर्वज्ञ, बलदेव, नारायण, प्रतिनारायण और चक्रवर्ती भी होते हैं ।। १७४ ।। इस प्रकार ईतिसे रहित, मर्यादासे सहित, गुणवान् पुरुषोंसे मण्डित और धर्म-कर्म से संयुक्त यह तीसरा सुकाल भी बीत जाता है ।। १७५ ।। तत्पश्चात् चौथा ( सुषमादुःषमा ), पांचवां सुषमा और छठा दो वार कहा गया सुषमा अर्थात् सुषमासुषमा ये तीन काल क्रमसे प्रवर्तमान होते हैं । इस प्रकार उत्सर्पिणीमें कालोंकी प्रवृत्ति मानी गई है ।। १७६ ॥ इस प्रकार लोकविभागमें कालविभाग नामक पांचवां प्रकरण समाप्त हुआ ॥ ५ ॥ Jain Education International १ ब मणुपि कुलो । २ आ प सदा । अतोऽग्रे आप 'जिनैज्र्ज्योतिषिकाः प्रोक्ता खे चरतः स्थिता अपि ' इत्यर्ध श्लोकोऽधिको लभ्यते । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001872
Book TitleLokvibhag
Original Sutra AuthorSinhsuri
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Geography
File Size22 MB
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