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________________ पद्मपुराणे दम्पती मधु वाग्छन्तौ पीतशेपं परस्परम् । चक्रतुः प्रसृतोल्लापौ चपकस्य गतागतम् ॥१४४॥ चषके विगतप्रीतिः कान्तामालिंग्य सुन्दरः। गण्डूषमदिरां कश्चित्पपौ मुकुलितेक्षणः ॥१४५॥ आसीद्विदुमकल्पानां किञ्चित्स्फुरणसेविनाम् । मधुक्षालितरागाणामधराणां परा ध्रुतिः ॥१४६॥ दन्ताधरेक्षणच्छायासंसर्गिचषके मधु । शुक्लारुणासिताम्भोजयुक्तं सर इवाभवत् ।।१४७॥ गोपनीयानदेश्यन्त प्रदेशान सुरया स्त्रियः । वाक्यान्यभाषणीयान्यभाषन्त च गतत्रपाः ॥१४॥ चन्द्रोदयेन मधुना यौवनेन च भूमिकाम् । आरूढो मदनस्तेषां तासां चात्यन्तमुखताम् ॥१४६॥ कृतक्षतं ससीत्कारं गृहीतोष्ठं समाकुलम् । सुरतं भावियुद्धस्य मङ्गलग्रहणायितम् ॥१५०॥ एषोऽपि रक्षसामिन्द्रश्चारुचेष्टितसङ्गतः । सममानयदुद्धनीरन्तःपुरमशेषतः ॥१५॥ मुहुर्मुहुः समालिङ्ग्य स्नेहान्मन्दोदरी विभोः । अपश्यद्वदनं तृप्तिमगच्छन्ती सुलोचना ॥१५२॥ इतः समरसंवृत्तात्परिप्राप्तजयस्य ते । आगतस्य सदा कान्त करिष्याम्यवगूहनम् ।।१५३।। मोक्ष्यामि क्षणमप्येकं न त्वां भूयो मनोहर । लतेव बाहुबलिनं सर्वाङ्गकृतसङ्गतिः ॥१५४।। वदन्त्यामेवमेतस्यां प्रेमकातरचेतसि । रुतं तान्नशिखश्चक्रे समाप्तिं च निशा गता ॥१५५॥ नक्षत्रदीधितिभ्रंशे प्राप्त संन्ध्यारुणागमे । गीतध्वनिरभूम्यो भवने भवनेऽहताम् ॥१५६॥ शब्दोंका उच्चारण हो रहा था ऐसी स्त्रियों और पुरुषों की मनको हरण करनेवाली विकट चेष्टा होने लगी ॥१४३।। पीते-पीते जो मदिरा शेष बच रही थी उसे भी दम्पती पी लेना चाहते थे इसलिए 'तुम पियो तुम पियो' इस प्रकार जोरसे शब्द करते हुए प्यालेको एक दूसरेकी ओर बढ़ा रहे थे ॥१४४॥ किसी सुन्दर पुरुषको प्रीति प्यालेमें समाप्त हो गई थी इसलिए वह वल्लभाका आलिङ्गनकर नेत्र बन्द करता हुआ उसके मुखके भीतर स्थित कुरलेकी मदिराका पान कर रहा था ॥१४५।। जो मूंगाके समान थे, जो कुछ-कुछ फड़क रहे थे तथा मदिराके द्वारा जिनकी कृत्रिम लाली धुल गई थी ऐसे अधरोष्ठोंकी अत्यधिक शोभा बढ़ रही थी ॥१४६।। दाँत, ओष्ठ और नेत्रों की कान्तिसे युक्त प्यालेमें जो मधु रक्खा था वह सफेद लाल और नील कमलोंसे युक्त सरोवरके समान जान पड़ता था ॥१४७। उस समय मदिराके कारण जिनकी लज्जा दूर हो गई थी ऐसी स्त्रियाँ अपने गुप्त प्रदेशोंको दिखा रही थीं तथा जिनका उच्चारण नहीं करना चाहिये ऐसे शब्दोंका उच्चारण कर रही थीं ॥१४८|| चन्द्रोदय, मदिरा और यौवनके कारण उस समय उन स्त्री-पुरुषोंका काम अत्यन्त उन्नत अवस्थाको प्राप्त हो चुका था ॥१४६॥ जिसमें नखक्षत किये गये थे, जो सीत्कारसे सहित था, जिसमें ओष्ठ डॅशा गया था तथा जो आकुलतासे युक्त था ऐसा स्त्री-पुरुषोंका संभोग आगे होनेवाले युद्धका मानो मङ्गलाचार ही था । ५०|| इधर सुन्दर चेष्टासे युक्त रावणने भी समस्त अन्तःपुरको एक साथ उत्तम शोभा प्राप्त कराई अर्थात् अन्तःपुरकी समस्त स्त्रियोंको प्रसन्न किया ॥१५१।। उत्तम नेत्रोंसे युक्त मन्दोदरी बार-बार आलिगनकर बड़े स्नेहसे पतिका मुख देखती थी तो भी तृप्त नहीं होती थी ।।१५२॥ वह कह रही थी कि हे कान्त ! जब तुम विजयी हो यहाँ लौटकर आओगे तब मैं सदा तुम्हारा आलिङ्गन करूँगी:५३।। हे मनोहर ! मैं तुम्हें एक क्षणके लिए भी न छोडूंगी और जिस प्रकार लताएँ बाहुबली स्वामीक समस्त शरीरमें समा गई थीं उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे समस्त शरीरमें समा जाऊँगी ॥१५४।। इधर प्रेमसे कातर चित्तको धारण करनेवाली मन्दोदरी इस प्रकार कह रही थी उधर मुर्गा बोलने लगा और रात्रि समाप्त हो गई ॥१५॥ अथानन्तर नक्षत्रोंको कान्तिको नष्ट करनेवाली सन्ध्याकी लाली आकाशमें आ पहुँची १. चपकेऽपि गत- म० । २. दन्ताघरक्षणच्छाया- म० । ३. शुक्लारूपासित म०। ४. नदर्शन्त म० । ५. गृहीत्वौष्ठं म०। ६. कुक्कुटः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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