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________________ त्रिसप्ततितमं पर्व कालाग्निमण्डलाकारो रश्मिभिश्छादयन दिशः। जगामोदयसम्बन्धं भास्करो लोकलोचनः ॥१५॥ प्रभातसमये देव्यो व्यग्राः कृच्छ्रेण सान्विताः । दयितेन मनस्यू हुः कि किमित्यतिदुःसहम् ॥१५॥ गम्भीरास्ताडिता भेर्यः शङ्खशब्दपुरःसराः। रावणस्याऽऽज्ञया युद्धसंज्ञादानविचक्षणाः ॥१५॥ परस्परमहंकारं वहन्तः परमोद्धताः । प्रहृष्टा निर्ययुर्योधा ययिद्विपरथस्थिताः ॥१६॥ असिचापगदाकुन्तभासुराटोपसकटाः। प्रचलचामरच्छत्रछायामण्डलशोभिनः ॥१६१॥ आशुकारसमुद्यक्ताः सुराकाराः प्रतापिनः । विद्याधराधिपा योद्धु निर्ययुः प्रवरर्द्धयः ॥१६२॥ तत्र पङ्कजनेत्राणां कारुण्यं पुरयोषिताम् । निरीच्य दुर्जनस्यापि चित्तमासीत्सुदुःखितम् ॥१६३॥ निर्गतो दयितां कश्चिदनुव्रज्यापरायणाम् । अयि मुग्धे निवर्तस्व व्रजामि संख्ये सत्यवाक् ॥१६४।। उष्णीषं भो गृहाणेति व्याजादभिमुखं प्रियम् । चक्रे काचिन्मृगीनेत्रा वक्त्रदर्शनलालसा ॥१६५॥ रष्टिगोचरतोऽतीते प्रिये काचिद्वराङ्गना। पतन्ती सह वाष्पेण सखी वृता ॥१६॥ निवृत्य काचिदाश्रित्य शयनीयस्य पट्टिकाम् । तस्थौ मौनमुपादाय पुस्तोपमशरीरिका ॥१६॥ सम्यग्दर्शनसम्पन्नः शूरः कश्चिदणुनती। पृष्ठतो वीच्यते पत्न्या पुरसिदशकन्यया ॥१६॥ पूर्व पूर्णेन्दुवत्सौम्या बभूवुस्तुमुलागमे । शूराः कवचितोरस्काः कृतान्ताकारभासुराः ।।१६६॥ चतुरङ्गेन सैन्येन चापछत्रादिसंकुलः । संप्राप्तस्तत्र मारीचो नैगमे सीबतेजसा ।।१७०॥ असौ विमलचन्द्रश्च धनुष्मान् विमलाम्बुदः । सुनन्दानन्दनन्दाद्याः शतशोऽथ सहस्रशः ॥१७१।। और अरहन्त भगवानके मन्दिर-मन्दिरमें संगीतका मधुर शब्द होने लगा ॥१५६।। प्रलयकालीन अग्निसमूहके समान जिसका आकार था ऐसा लोकलोचन सूर्य, किरणोंसे दिशाओंको आच्छादित करता हुआ उदयाचलके साथ सम्बन्धको प्राप्त हुआ ॥१५७।। प्रातःकालके समय पति जिन्हें बड़ी कठिनाईसे सान्त्वना दे रहा था ऐसी स्त्रियाँ व्यग्र होती हुई मनमें न जाने क्या-क्या दुःसह विचार धारण कर रही थीं ॥१५८॥ तदनन्तर रावणको आज्ञासे युद्धका संकेत देनेमें निपुण शङ्ख के गये और गम्भीर भेरियाँ बजाई गई ॥१५६॥ जो परस्पर अहंकार धारण कर रहे थे तथा भत्यन्त उद्धत थे ऐसे योद्धा घोड़े हाथी और रथोंपर सवार हो हर्षित होते हुए बाहर निकले ॥१६०॥ जो खड्ग, धनुष, गदा, भाले आदि चमकते हुए शस्त्र समूहको धारण कर रहे थे, जो हिलते हुए चमर और छत्रोंकी छायासे सुशोभित थे, जो शीघ्रता करनेमें तत्पर थे, देवोंके समान थे और अतिशय प्रतापी थे ऐसे विद्याधर राजा बड़े ठाट-बाटसे युद्ध करनेके लिए निकले ॥१०१-१६२।। उस समय निरन्तर रुदन करनेसे जिनके नेत्र कमलके समान लाल हो गये थे ऐसी नगरकी स्त्रियोंकी दीनदशा देख दुष्ट पुरुषका भी चित्त अत्यन्त दुःखी हो उठता था ॥१६३॥ कोई एक योद्धा पीछे-पीछे आनेवाली स्त्रीसे यह कहकर कि 'अरी पगली ! लौट जा मैं सचमुच ही युद्धमें जा रहा हूँ' बाहर निकल आया ।।१६४॥ किसी मृगनयनी स्त्रीको पतिका मुख देखनेकी लालसा थी इसलिए उसने इस बहाने कि अरे शिरका टोप तो लेते जाओ, पतिको अपने सम्मुख किया था ॥१६५।। जब पति दृष्टिके ओझल हो गया तब अश्रुओंके साथ-साथ कोई खी मूच्छित हो नीचे गिर पड़ी और सखियोंने उसे घेर लिया ॥१६६।। कोई एक स्त्री वापिस लौट, शय्याकी पाटी पकड़, मौन लेकर मिट्टीकी पुतलीकी तरह चुपचाप बैठ गई ॥१६७। कोई एक शूरवीर सम्यग्दृष्टि तथा अणुव्रतोंका धारक था इसलिए उसे पीछेसे तो उसकी पत्नी देख रही थी और आगेसे देवकन्या देख रही थी ॥१६८॥ जो योद्धा पहले पूर्ण चन्द्रके समान सौम्य थे वे ही युद्ध उपस्थित होनेपर कवच धारण कर यमराजके समान दमकने लगे ॥१६॥ जो धनुष तथा छत्र आदिसे सहित था ऐसा मारीच चतुरङ्गिणी सेना ले बड़े तेजके साथ नगरके बाहर आया ॥१७०।। धनुषको धारण करनेवाले विमलचन्द्र, विमलमेघ, सुनन्द, आनन्द तथा नन्दको आदि १. सुखमित्यवाक् म० । २. प्रस्तोपम म० । ३. कर्णेन्दु म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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