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________________ त्रिसप्ततितम पर्व ४8 प्रियं प्रणयिनी काचिदालिंग्योचे सवेपथुः । अप्येकां शर्वरीमेतां मानयामि त्वया सह ॥१३०॥ उद्वमद्यथिकाऽऽमोदमधुमत्ता विघूर्णिता । पर्यस्ता काचिदीशाके पुष्पवृष्टिः सुकोमला ॥१३१॥ अब्जतुल्यक्रमा काचित् पीवरोरुपयोधरा । वपुष्मती वपुष्मन्तं दयिता दयितं ययौ ॥१३२॥ जग्राह भूषणं काचित्स्वभावेनैव सुन्दरी । कुर्वन्ती हेमरत्नानां चारुभावा कृतार्थताम् ॥१३३॥ सुविद्याधरयुग्मानि प्रचिक्रीडुर्यथेप्सितम् । भवने भवने भान्ति' सदृशं भोगभूमिषु ॥१३॥ गीतानगवालापैर्वीणावंशादिनिःस्वनैः । जल्पतीव तदा लङ्का मुदिता क्षणदाऽऽगमे ॥१३५॥ ताम्बूलगन्धमाल्याद्यरूपभोगैः सुरोपमैः । पिबन्तो मदिरामन्ये रमन्ते दयितान्विताः ॥१३६॥ काचित्स्ववदनं दृष्ट्रा चषकप्रतिबिम्बितम् । ईययेन्दीवरेणेशं प्राप्ता मदमताडयत् ॥१३७॥ मदिरायां परिन्यस्तं नारीभिर्मुखसौरभम् । लोचनेषु निजो रागस्तासां मदिरया कृतः ॥१३॥ तदेव वस्तु संसद्धत्ते परमचारुताम् । तथाहि दयितापीतशेष स्वादभवन्मधु ॥१३॥ मदिरापतितां काञ्चिदात्मीयां लोचनद्य तिम् । गृहन्तीन्दीवरप्रीत्या कान्तेन हसिता चिरम् ॥१४०।। अप्रौढापि सती काचिच्छनकैः पायिता सुराम् । जगाम प्रौढतां बाला मन्मथोचितवस्तुनि ॥१४॥ लजासखीमपाकृत्य तालामत्यन्तमीप्सितम् । कृतं कादम्बरीसख्या प्रियेषु क्रीडितं परम् ॥१४२॥ घूर्णमानेक्षणं भूयः कलस्खलितजल्पितम् । चेष्टितं विकटं स्त्रीणां पुंसां जातं मनोहरम् ॥१४३॥ समान सुशोभित हो उठी ॥१२६॥ उस समय कोई स्त्री पतिका आलिङ्गन कर काँपती हुई बोली कि तुम्हारे साथ यह एक रात तो आनन्दसे बिता लूँ कल जो होगा सो होगा ॥१३०|| जिसकी चोटीमें गुंथी हुई जुहीकी मालासे सुगन्धि निकल रही थी तथा जो मधुके नशामें मत्त हो झूम रही थी ऐसी कोई एक स्त्री पतिकी गोद में उस तरह लोट गई मानो अत्यन्त कोमल पुष्प वृष्टि ही विखेर दी गई हो ॥१३१॥ जिसके चरण कमलके समान थे तथा जिसकी जाँघ और स्तन अत्यन्त स्थूल थे ऐसी सुन्दर शरीरकी धारक कोई स्त्री सुन्दर शरीरके धारक बल्लभके पास गई हो ॥१३२॥ जो स्वभावसे ही सुन्दरी थी तथा सुन्दर हाव-भावको धारण करनेवाली थी ऐसी किसी स्त्रीने सुवर्ण और रत्नोंको कृत-कृत्य करनेके लिए ही मानो उसने आभूषण धारण किये थे ॥१३३॥ विद्याधर और विद्याधरियोंके युगल इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे थे और वे घर-घरमें ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भोगभूमियोंमें ही हो ॥१३४।। संगीतके कामोत्तेजक आलापों और वीणा बाँसुरी आदिके शब्दोंसे उस समय लंका ऐसी जान पड़ती थी मानो रात्रिका आगमन होने पर हर्षित हो वार्तालाप ही कर रही हो ॥१३५॥ कितने ही अन्य लोग ताम्बूल गन्धमाला आदि देवोपम उपभोगोंसे मदिरा पीते हुए अपनी वल्लभाओंके साथ क्रीड़ा करते थे॥१३६।। नशामें निमग्न हुई कोई एक स्त्री मदिराके प्यालेमें प्रतिविम्बित अपना ही मुख देख ईयावश नीलकमलसे पतिको पीट रही थी ।।१३७।। स्त्रियोंने मदिरामें अपने मुख की सुगन्धि छोड़ी थी और मदिराने उसके बदले स्त्रियोंके नेत्रों में अपनी लालिमा छोड़ रक्खी थी ॥१३८।। वही वस्तु इष्टजनोंके संसर्गसे परम सुन्दरताको धारण करने लगती है इसी लिए तो स्त्रीके पीनेसे शेष रहा मधु स्वादिष्ट हो गया था ॥१३६॥ कोई एक स्त्री मदिरामें पड़ी हुई अपने नेत्रोंकी कान्तिको नीलकमल समझ ग्रहण कर रही थी सो पतिने उसकी चिरकाल तक हँसी की ॥१४०॥ कोई एक स्त्री यद्यपि प्रौढ़ नहीं थी तथापि धीरे-धीरे उसे इतनी अधिक मदिरा पिला दी गई कि वह कामके योग्य कायमें प्रौढ़ताको प्राप्त हो गई अथोत् प्रौढ़ा स्त्रीके समान कामभोगके योग्य हो गई ॥१४१।। उस मदिरारूपी सखीने लज्जारूपी सखीको दूर कर उन स्त्रियोंकी पतियोंके विषय में ऐसी क्रीड़ा कराई जो उन्हें अत्यन्त इष्ट थी अर्थात् स्त्रियाँ मदिराके कारण लज्जा छोड़ पतियोंके साथ इच्छानुकूल क्रीड़ा करने लगीं ।।१४२॥ जिसमें नेत्र घूम रहे थे तथा बार-बार मधुर अधकटे १. भाति ज० । २. इवालापै- म० । ३. पीतं रोष म० । ४. कलै स्खलित म० । JainEducation Internatichar For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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