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________________ त्रिसप्ततितमं पर्व उद्धर्यत्वं गभीरत्वं परिज्ञातं च तस्कृते । गतं येन कुमार्गेण नाथ केनापि नीयसे ॥५२॥ दृष्ट्वा शरभवच्छायामात्मीयां कूपवारिणि । किं प्रवृत्तोऽसि परमामापदायासदायिनि ॥५३॥ अयशः शालमुत्तङ्गंभिरवा क्लेशकरं परम् । कदलीस्तम्भनिःसारं फलं किमभिवाञ्छसि ॥५४॥ श्लाध्यं जलधिगम्भीरं कुलं भूयो विभूषय । शिरोऽर्ति कुलजातानां मुञ्च भूगोचर स्त्रियम् ।।५५।। विरोधः क्रियते स्वामिन् वीरैः स्वाप्तिप्रयोजनः । मृत्यु च मानसे कृत्वा परेपामात्मनोऽपि वा ॥५६॥ पराजित्यापि संघातं नाथ सम्बन्धिनां तव । कोऽर्थः सम्पद्यते तस्मात्त्यज सीतामयं ग्रहम् ॥५७॥ अन्यदास्तां व्रतं तावत्परस्त्रीमुक्तिमात्रतः । पुमान् जन्मद्वये शंसां सुशीलः प्रतिपद्यते ॥५॥ कजलोपमकारीषु परनारीषु लोलुपः । मेरुगौरवयुक्तोऽपि तृणलाघवमेति ना ॥५६॥ देवैरनुगृहोतोऽपि चक्रवर्तिसुतोऽपि वा । परस्त्रीसङ्गपङ्केन दिग्धोऽकीर्ति व्रजेत्पराम् ॥६॥ योऽन्यप्रमदया साकं कुरुते मूढको रतिम् । आशीविषभुजइण्याऽसौ रमते पापमानसः ॥६१॥ निर्मलं कुलमत्यन्तं मायशोमलिनं कुरु । आत्मानं च करोषि त्वं तस्माद्वर्जय दुर्मतिम् ॥१२॥ धवान्तराबलेच्छातः प्राप्ताः नाशं महाबलाः । सुमुखाशनिघोषाधास्ते च किं न गताः श्रतिम् ॥६३॥ सितचन्दनदिग्धाङ्गो नवजीमूतसन्निभः । मन्दोदरीमथावोचद्रावणः कमलेक्षणः ॥६॥ करनेवाले हैं ।।५.१॥ आपकी उत्कृष्ट धीरता, गम्भीरता और विचारकता उस सीताके लिए जिस कुमार्गसे गई है हे नाथ ! जान पड़ता है कि आप भी किसीके द्वारा उसी कुमार्गसे ले जाये जा रहे हैं ॥५२॥ जिस प्रकार अष्टापद कुएँके जलमें अपनी परिछाई देख दुःखको प्राप्त हुआ उसी प्रकार अत्यन्त दुःख देनेवाली आपत्तियों में तुम किसलिए प्रवृत्त हो रहे हो ॥५३॥ अत्यधिक क्लेश उत्पन्न करनेवाले अपयशरूपी ऊँचे वृक्षको भेदन कर सुखसे रहिये । आप केलेके स्तम्भके समान . किस निःसार फलकी इच्छा रखते हैं ।।५४।। हे समुद्र के समान गम्भीर ! अपने प्रशस्त कुलको फिरसे अलंकृत कीजिए और कुलीन मनुष्योंके शिर दर्दके समान भूमिगोचरीकी स्त्री-सीताको शीघ्र ही छोड़िए ||५५।। हे स्वामिन् ! वीर सामन्त जो एक दूसरेका विरोध करते हैं सो धनकी प्राप्तिके प्रयोजनसे करते हैं अथवा मनमें ऐसा विचारकर करते हैं कि या तो पर को मारूँ या मैं स्वयं मरूँ । सो यहाँ धनकी प्राप्ति तो आपके विरोधका प्रयोजन हो नहीं सकती क्योंकि आपको धनकी क्या कमी है ? और दूसरा प्रयोजन अपना पराया मरना है सो किसलिए मरना ? पराई स्त्रीके लिए मरना यह तो हास्यकर बात है ।।५६।। अथवा माना कि शत्रुओंके समूहका, पराजित करना विरोधका प्रयोजन है सो शत्रु समूहको पराजित करने पर आपका कौनसा प्रयोजन सम्पन्न होता है ? अतः हे स्वामिन् ! सीतारूपी हठ छोड़िए ॥५७|| और दूसरा व्रत रहने दीजिए एक परस्त्रीत्याग व्रत के द्वारा ही उत्तम शीलको धारण करनेवाला पुरुष दोनों जन्मोंमें प्रशंसाको प्राप्त होता है ॥५८|| कजलको उपमा धारण करनेवाली परस्त्रियोंका लोभी मनुष्य, मेरुके समान गौरवसे युक्त होने पर भी तृणके समान तुच्छताको प्राप्त हो जाता है ||५६|| देव जिस पर अनुग्रह करते हैं अथवा जो चक्रवर्तीका पुत्र है वह भी परस्त्रीकी आसक्तिरूपी कर्दमसे लिप्त होता हुआ परम अकीर्तिको प्राप्त होता है, जो मूख परस्त्रीके साथ प्रेम करता है मानो वह पापी आशीविष नामक सर्पिणीके साथ रमण करता है॥६०-६१।। अत्यन्त निर्मल कुलको अपकीर्तिसे मलिन मत कीजिए । अथवा आप स्वयं अपने आपको मलिन कर रहे हैं सो इस दर्बद्धिको छोडिए ॥६२।। समुख तथा वज्रघोष आदि महाबलवान् पुरुष, परस्त्रीकी इच्छा मात्रसे नाशको प्राप्त हो चुके सो क्या वे आपके सुननेमें नहीं आये ? ॥६३।।। अथानन्तर जिसका समस्त शरीर सफेद चन्दनसे लिप्त था तथा जो स्वयं नूतन मेघके १. चक्रवर्तिसमोऽपि वा क०। २. अन्यो धवो धवान्तरः परपुरुषस्तथावला तस्य इच्छा तस्याः परपुरुषवनिताया इच्छामात्रत इति भावः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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