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________________ त्रिसप्ततितमं पर्व प्रणिपत्य ततो देवी मित्याहुर्मुख्यमन्त्रिणः । कृतान्तशासनो मानी स्वप्रधानो दशाननः ॥२५॥ वचनं कुरुते यस्य नरस्य परमं हितम् । न स स्वामिनि ! लोकेऽस्मिन् समस्तेऽप्युपलभ्यते ॥२६।। या काचिद्भविता बुद्धिनृणां कर्मानुवर्तिनाम् । अशक्या साऽन्यथाकत सेन्ट्रैः सुरगणैरपि ॥२७॥ अर्थसाराणि शास्त्राणि नयनौशनसं परम् । जाननपि त्रिकूटेन्द्रः पश्य मोहन बाध्यते ॥२८।। उक्तः स बहशोऽस्माभिः प्रकारेण न केन सः । तथापि तस्य नो चित्तमभिप्रेताग्निवत्तते ॥२६॥ महापूरकृतोत्पीडः पयोवाहसमागमे । दुष्करो हि नदो धतु जीवो वा कर्मचोदितः ॥३०॥ ईशे तथापि को दोषः स्वयं वस्तुं त्वमसि । कदाचित्ते मतिं कुर्यादुपेक्षणमसाम्प्रतम् ॥३॥ इत्युदाहृतमाधाय निश्चिन्तस्वान्तधारिणी। परिवेपवती लक्ष्मीरिव सम्भ्रमवर्तिनी ।।३२॥ स्वच्छायतविचित्रेण पयःसादृश्यधारिणा । अंशुकेनावृता देवी गन्तुं रावणमुद्यता ॥३३॥ मन्मथस्यान्तिकं गन्तुं तां प्रवृत्तां रति यथा । परिवगः समालोक्य तत्परत्वमुपागतः ॥३४।। छत्रचामरधारीभिरङ्गनाभिः समन्ततः । आपूर्यत शचीवेन्द्रं वजन्तो प्रवरानना ।।३५॥ श्वसन्ती प्रस्खलन्ती च किञ्चिच्छिथिलमेखला । प्रियकायरता नित्यमनुरागमहानदी ॥३६।। आयान्ती तेन सा दृष्टा लीलावतेन चक्षुषा । स्पृश ना कवचं मुख्यं शस्त्रजातं च सादरम् ॥३७॥ उक्ता मनोहरे हंसवधूललितगामिनि । रभसेन किमायान्त्यास्तव देवि प्रयोजनम् ॥३८॥ तदनन्तर मुख्य मन्त्रियोंने प्रणाम कर मन्दोदरी से इस प्रकार कहा कि हे देवि ! दशाननका शासन यमराजके शासनके समान है, वे अत्यन्त मानी और अपने आपको ही प्रधान मानने वाले हैं ॥२५॥ जिस मनुष्यके परम हितकारी वचनको वे स्वीकृत कर सके हे स्वामिनि ! समस्त लोकमें ऐसा मनुष्य नहीं दिखाई देता ।।२६॥ कर्मानुकूल प्रवृत्ति करनेवाले मनुष्योंकी जो बुद्धि होनेवाली है उसे इन्द्र तथा देवोंके समूह भी अन्यथा नहीं कर सकते ॥२७॥ देखो, रावण समस्त अर्थ शास्त्र और सम्पूर्ण नीतिशास्त्रको जानते हैं तो भी मोहके द्वारा पीड़ित हो रहे हैं ॥२८॥ हम लोगोंने उन्हें अनेकों बार किस प्रकार नहीं समझाया है ? अर्थात् ऐसा प्रकार शेष नहीं रहा जिससे हमने उन्हें न समझाया हो फिर भी उनका चित्त इष्ट वस्तु-सीतासे पीछे नहीं हट रहा है ॥२६॥ वर्षा ऋतुके समय जिसमें जलका महा प्रवाह उल्लंघ कर बह रहा है ऐसे महानदको अथवा कर्मसे प्रेरित मनुष्यको रोक रखना कठिन काम है ।।३०॥ हे स्वामिनि ! यद्यपि हम लोग कह कर हार चुके है तथापि आप स्वयं कहिये इसमें क्या दोष है ? संभव है कि कदाचित् आपका कहना उन्हें सुबुद्धि उत्पन्न कर सके। उपेक्षा करना अनुचित है ॥३१।। इस प्रकार मन्त्रियोंका कहा श्रवण कर जिसने रावणके पास जाने का निश्चित विचार किया था, जो भय से काँप रही थी तथा घबड़ाई हुई लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, जो स्वच्छ, लम्बे, विचित्र और जल की सदृशताको धारण करनेवाले वस्त्रसे आवृत्त थी ऐसी मन्दोदरी रावणके पास जानेके लिए उद्यत हुई ॥३२-३३॥ कामदेवके सपोप जानेके लिए उद्यत रतिके समान, रावणके समीप जाती हुई मन्दोदरीको देख परिवारके समस्त लोगोंका ध्यान उसीकी ओर जा लगा ॥३४॥ छत्र तथा चमरोंको धारण करनेवाली स्त्रियाँ जिसे सब ओरसे घेरे हुई थीं ऐसी समुखी मन्दोदरी ऐसी जान पड़ती थी मानो इन्द्रके पास जाती हुई शची ही हो-इन्द्राणी ही हो ॥३५।। जो लम्बी साँस भर रही थी, जो चलती-चलती बीच में स्खलित हो जाती थी, जिसकी करधनी कुछ-कुछ ढीली हो रही थी, जो निरन्तर पतिका कार्य करने में तत्पर थी और जो अनुरागकी मानो महानदी ही थी ऐसी आती हुई मन्दोदरीको रावण ने लीलापूर्ण चक्षुसे देखा । उस समय रावण अपने कवच तथा मुख्य-मुख्य शस्त्रोंके समूहका आदरपूर्वक स्पर्श कर रहा था ॥३६-३७॥ रावणने कहा कि हे मनोहरे ! हे हंसोके समान सुन्दर चालसे चलनेवाली Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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