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________________ द्वादशोत्तरशतं पर्व ३५७ कृष्णपक्षे तदा रात्रिस्ताराबन्धुभिरावृता। रहिता चन्द्रनाथेन नितान्तं न विराजते ॥७२॥ अवतीर्य ततस्तेन सुरदुन्दुभिनामनि । शैलपादे परं रम्ये सैन्यमावासितं शनैः ॥७३॥ तत्र पनोत्पलामोदवाहिमन्थरमारुते' । सुखं जिनकथाऽऽसत्ता यथास्वं सैनिकाः स्थिताः।।७४॥ अथोपरि विमानस्य निषण्णः शिखरान्तिके । प्रारभारचन्द्रशालायाः कैलासाधित्यकोपमे ।।७५|| ज्योतिष्पथात्समुत्तुङ्गात्पतत्प्रस्फुरितप्रभम् । ज्योतिर्बिम्बं मरुत्सूनुरालोकत तमोऽभवत् ॥७६॥ अचिन्तयञ्च हा कट संसारे नास्ति तत्पदम् । यत्र न कीडति स्वेच्छं मृत्युः सुरगणेष्वपि ॥७॥ तडिदुल्कातरङ्गातिभङ्गुरं जन्म सर्वतः । देवानामपि यत्र स्यात् प्राणिनां तत्र का कथा ॥७८।। अनन्तशो न भुक्तं यत्संसारे चेतनावता । न तदास्ति सुखं नाम दुःखं वा भुवनत्रये ॥७॥ अहो मोहस्य माहात्म्यं परमेतद्बलान्वितम् । एतावन्तं यतः कालं दुःखपर्यटितं भवेत् ।।८०॥ उत्सर्पिण्यवसपिण्यौ भ्रान्त्वा कृच्छ्रात्सहस्रशः । अवाप्यते मनुष्यत्वं कष्टं नष्टमनाप्तवत् ॥८॥ विनश्वरसुखासक्ताः सौहित्यपरिवर्जिताः। परिणामं प्रपद्यन्ते प्राणिनस्तापसङ्कटम् ॥२॥ चलान्युत्पथवृत्तानि दुःखदानि पराणि च । इन्द्रियाणि न शाम्यन्ति विना जिनपथाश्रयात् ।।८३॥ आनायेन यथा दीना बध्यन्ते मृगपक्षिणः । तथा विषयजालेन बध्यन्ते मोहिनो जनाः ।।८।। आशीविषसमानो रमते विषयः समम् । परिणामे स मूढात्मा दह्यते दुःखवह्निना ।।८५॥ को येकदिवसं राज्यं वर्षमविष्य यातनाम् । प्रार्थयेत विमूढारमा तद्वद्विषयसौख्यभाक ॥८६॥ वह समय कृष्ण पक्षका था, अतः तारारूपी बन्धओंसे आवृत और चन्द्रमारूपी पतिसे रहित रात्रि अत्यधिक सुशोभित नहीं हो रही थी इसलिए उसने आकाशसे उतर सुरदुन्दुभि नामक परम मनोहर प्रत्यन्त पर्वतपर धीरेसे अपनी सेना ठहरा दी ॥७२-७३।। जहाँ कमलों और नील कमलोंकी सुगन्धिको धारण करनेवाली वायु धीरे-धीरे बह रही थी ऐसे उस प्रत्यन्त पर्वतपर जिनेन्द्रभगवानको कथामें लीन सैनिक यथायोग्य सुखसे ठहर गये ॥७४| ___अथानन्तर हनूमान् कैलास पर्वतके ऊपरो मैदानके समान विमानको चन्द्रशाला सम्बन्धी शिखरके समीप सुखसे बैठा था कि उसने बहुत ऊँचे आकाशसे गिरते हुए तथा क्षण एकमें अन्धकार रूप हो जाने वाले देदीप्यमान कान्तिके धारक ज्योतिर्बिम्बको देखा ||७५-७६॥ देखते ही वह विचार करने लगा कि हाय हाय बड़े दुःखकी बात है कि इस संसारमें वह स्थान नहीं है जहाँ देवसमूहके बीच भी मृत्यु इच्छानुसार क्रीड़ा नहीं करती हो ॥७७। जहाँ देवोंका भी जन्म सब ओरसे बिजली, उल्का और तरङ्गके समान अत्यन्त भङ्गुर है वहाँ अन्य प्राणियोंकी तो कथा ही क्या है ? ॥७८॥ इस प्राणीने संसारमें अनन्तबार जिख सुख-दुःखका अनुभव नहीं किया है वह तीन लोकमें भी नहीं है ॥७६॥ अहो ! यह मोहकी बड़ो प्रबल महिमा है कि यह जीव इतने समय तक दुःखसे भटकता रहा है ॥८॥ हजारों उत्सर्पिणियों और अपसर्पिणियोंमें कष्ट सहित भ्रमण करनेके बाद मनुष्य पर्याय प्राप्त होती है सो खेद है कि वह उस प्रकार नष्ट हो गई कि जिस प्रकार मानो प्राप्त ही न हुई हो ॥१॥ विनाशी सुखोंमें आसक्त प्राणी कभी तृप्ति को प्राप्त नहीं होते और उसी अतृप्त दशामें संतापसे परिपूर्ण अन्तिम अवस्थाको प्राप्त हो जाते हैं ॥५२॥ चश्चल, कुमार्गमें प्रवृत्ति करने वाली और अत्यन्त दुःखदायी इन्द्रियाँ जिन-मागेका आश्रय लिए बिना शान्त नहीं होतीं ॥८३॥ जिस प्रकार दीन मृग और पक्षी जालसे बद्ध हो जाते हैं उसी प्रकार ये मोही प्राणी विषय-जालसे बद्ध होते हैं ।।८४॥ जो मनुष्य सर्पके समान विषयोंके साथ क्रीड़ा करता है वह मूर्ख फलके समय दुःख रूपी अग्निसे जलता है ॥८॥ जैसे कोई मनुष्य वर्षभर कष्ट भोगकर एक दिनके राज्यकी अभिलाषा करे वैसे ही विषय-सुखका उपभोग करने १. मारुताः म० । २. हनुमान् । ३. अनाप्यैनं म०, ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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