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________________ ३५८ पद्मपुराणे कदाचिद् बुध्यमानोऽपि मोहतस्करवश्चितः । न करोति जनः स्वार्थ किमतः कष्टमुत्तमम् ॥७॥ भुक्त्वा त्रिविष्टपे धर्म मनुष्यभवसञ्चितम् । पश्चान्मुषितवद्दीनो दुःखी भवति चेतनः ॥८॥ भुक्त्वापि त्रैदशान् भोगान् सुकृते क्षयमागते । शेषकर्मसहायः सन् चेतनः कापि गच्छति ।।८।। एतदेवं प्रतीच्येण त्रिजगत्पतिनोदितम् । यथा जन्तोनिजं कर्म बान्धवः शत्रुरेव वा ॥१०॥ तदलं निन्दितैरेभिर्भोगैः परमदारुणैः । विप्रयोगः सहामीभिरवश्यं येन जायते ॥६॥ प्रियं जनमिमं त्यक्त्वा करोमि न तपो यदि । तदा सुभूमचक्रीव मरिष्याम्यवितृप्तकः ॥१२॥ श्रीमस्यो हरिणीनेत्रा योषिद्गुणसमन्विताः । अत्यन्तदुस्त्यजा मुग्धा मदाहितमनोरथाः ॥६३।। कथमेतास्त्यजामीति सञ्चिन्त्य विमनाः क्षणम् । अश्राणयदुपालम्भ हृदयस्य प्रबुद्धधीः ॥१४॥ अशातच्छन्दः (१) दीर्घ कालं रत्वा नाके गुणयुवतीभिः "सुविभूतिभिः । मर्यक्षेत्रेऽप्यसमं भूयः प्रमदवरललितवनिताजनैः परिललितः ॥१५॥ अशातच्छन्दः (१) को वा यातस्तृप्ति जन्तुविविधविषयसुखरतिभिर्नदीभिरिवोदधिः । नानाजन्मभ्रान्त श्रान्त व्रज हृदय शममपि किमाकुलितं भवेत् ॥६६॥ वाला यह मूर्ख प्राणी, चिरकाल तक कष्ट भोगकर थोड़े समयके लिए सुख की आकांक्षा करता है ॥८६।। यद्यपि यह प्राणी जानता हुआ भी मोहरूपी चोरके द्वारा ठगाया जाता है तथापि कभी आत्मकल्याण नहीं करता इससे अधिक कष्ट और क्या होगा ? ||८| यह प्राणी मनुष्यभवमें संचित धर्मका स्वर्गमें उपभोगकर पश्चात् लुटे हुए मनुष्यके समान दीन और दुःखी हो जाता है ।।८।। यह जीव देवों सम्बन्धी भोग भोगकर भी पुण्यके क्षीण होनेपर अवशिष्ट कर्मोंकी सहायतासे जहाँ कहीं चला जाता है ।।८।। पूज्यवर त्रिलोकीनाथने यही कहा है कि इस प्राणीका बन्धु अथवा शत्र अपना कर्म ही है ॥६०|| इसलिए जिनके साथ अवश्य ही वियोग होता है ऐसे उन निन्दित तथा अत्यन्त कठोर भोगोंसे पूरा पड़े-उनकी हमें आवश्यकता नहीं है ।।६।। यदि मैं इन प्रियजनोंका त्यागकर तप नहीं करता हूँ तो सभम चक्रवर्तीके समान अतृप्त दशामें मरूँगा ।।१२।। 'जो हरिणियोंके समान नेत्रोंवाली हैं, स्त्रियोंके गुणोंसे सहित हैं, अत्यन्त कठिनाई से छोड़ने योग्य हैं, भोली हैं और मुझपर जिनके मनोरथ लगे हुए हैं ऐसी इन श्रीमती स्त्रियोंको कैसे छोड़ें। ऐसा विचारकर यद्यपि वह क्षणभरके लिए बेचैन हुआ तथापि वह तत्काल ही प्रबुद्ध बुद्धि हो हृदयके लिए इस प्रकार उलाहना देने लगा ॥६३-६४|| कि हे हृदय ! जिसने दीर्घकाल तक स्वर्गमें उत्तम विभूतिकी धारक गुणवती स्त्रियोंके साथ रमण किया तथा मनुष्य-लोकमें भी जो अत्यधिक हर्षसे भरी सुन्दर स्त्रियोंसे लालित हुआ ऐसा कौन मनुष्य नदियोंसे समुद्रके समान नाना प्रकारके विषय-सुख सम्बन्धी प्रीतिसे सन्तुष्ट हुआ है ? अर्थात् कोई नहीं। इसलिए हे नाना जन्मोंमें भटकनेवाले श्रान्त हृदय ! शान्तिको प्राप्त हो, व्यर्थ ही आकुलित क्यों हो १. वध्यमानोऽपि म । २. त्रिदशान् म० । ३. गच्छसि म०। ४. एतदेवं प्रतीक्षेण म० 'पूज्यः प्रतीक्ष्यः' इत्यमरः। ५. समनुभूतिभिः म०। ६. प्रमदवरवनिताजनैः म०। ७. खपुस्तके ६४-६५ तमश्लोकयोः क्रमभेदो वर्तते। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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