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________________ नवोत्तरशतं पर्व ३३७ गुरुराह ततः कान्त हे यक्ष कमलेक्षण । मृष्यतामनयोर्दोषो मोहप्रजडचित्तयोः ॥१२॥ जिनशासनवात्सल्यं कृतं सुकृतिना त्वया । नैतं प्राणिवधं भद्र मदर्थ कत्तु महंसि ॥१२२।। यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्त्वा गुह्यकेन विसर्जितौ । आश्वस्योपसृतौ भक्त्या पादमूलं गुरोस्ततः ॥१२३॥ नम्रौ प्रदक्षिणां कृत्वा शिरःस्थकरकुड़मली । साधवीयां महाचर्या ग्रहीतुं शक्तिवर्जितौ ॥१२॥ अणुव्रतानि गृह्णीतां सम्यग्दर्शनभूषितौ । अमूढौ श्रावको जातौ गृहधर्मसुखे रतौ ॥१२५॥ पितरावनयोः सम्यकश्रद्धयाऽपरिकीर्तितौ । कालं गतौ विना धर्माद्धमितौ भवसागरे ॥१२६॥ तौ तु सन्त्यक्तसन्देही जिनशासनभावितौ । हिंसाचं लौकिकं कार्य वर्जयन्तौ विषं यथा ॥१२॥ कालं कृत्वा समुत्पन्नौ सौधर्म विबुधोत्तमौ । सर्वेन्द्रियमनोहादं यत्र दिव्यं महत्सुखम् ॥ १२८॥ एत्यायोध्या समुद्रस्य धारिण्याः कुक्षिसम्भवौ । नन्दनौ नयनानन्दौ श्रेष्ठिनस्तौ बभूवतुः ॥१२॥ पूर्णकाञ्चनभद्राख्यौ भ्रातरावेव तौ सुखम् । पुनः प्रावकधर्मेण गतौ सौधर्मदेवताम् ।।१३०॥ अयोध्यानगरीन्द्रस्य हेमनाभस्य भामिनी । नाम्नाऽमरावती तस्यां समुत्पनी दिवश्च्युतौ ॥१३॥ जगतीह प्रविख्याती संज्ञया मधुकैटभो । अजय्यौ भ्रातरौ चारू कृतान्तसमविभ्रमौ ॥१३॥ ताभ्यामियं समाक्रान्ता मही सामन्तसङ्कटा । स्थापिता स्वतशे राजन् प्रज्ञाभ्यां शेमुषी यथा ॥१३३॥ नेच्छत्याज्ञां नरेन्द्रको भीमो नाम महाबलः । शलान्तः पुरमाश्रित्य चमरो नन्दनं यथा ॥१३॥ तदनन्तर मुनिराजने कहा कि हे कमललोचन ! सुन्दर ! यक्ष ! जिनका चित्त मोहसे अत्यन्त जड़ हो रहा है ऐसे इन दोनोंका दोष क्षमा कर दिया जाय ॥१२१॥ तुझ पुण्यात्माने जिन-शासनके साथ वात्सल्य दिखलाया यह ठीक है किन्तु हे भद्र ! मेरे निमित्त यह प्राणिवध करना उचित नहीं है ॥१२२॥ तत्पश्चात् 'जैसी आप आज्ञा करें' यह कहकर यक्षने दोनों विप्रपुत्रोंको छोड़ दिया । तदनन्तर दोनों ही विप्र-पुत्र समाधान होकर भक्तिपूर्वक गुरुके चरण-मूलमें पहुँचे ॥१२३।। और दोनोंने ही हाथ जोड़ मस्तकसे लगा प्रदक्षिणा देकर उन्हें नमस्कार किया तथा साधु दीक्षा प्रदान करनेकी प्रार्थना की। परन्तु साधु-सम्बन्धी कठिन चर्याको ग्रहण करनेके लिए उन्हें शक्तिरहित देख मुनिराजने कहा कि तुम दोनों सम्यग्दर्शनसे विभूषित होकर अणुव्रत ग्रहण करो। आज्ञानुसार वे गृहस्थ धर्मके सखमें लीन विवेकी श्रावक हो गये ॥१२४-१२इनके माता-पिता समोचीन श्रद्धासे रहित थे इसलिए मरकर धर्मके विना संसार सागरमें भ्रमण करते रहे ॥१२६॥ परन्तु अग्निभूति और वायुभूति संदेह छोड़ जिनशासनकी भावनासे ओत-प्रोत हो गये थे, तथा हिंसादिक लौकिक कार्य उन्होंने विषके समान छोड़ दिये थे इसलिए वे मरकर उस सौधर्म स्वर्गमें उत्तम देव हुए जहाँ कि समस्त इन्द्रियों और मनको आह्लादित करनेवाला दिव्य महान सुख उपलब्ध था ॥१२७-१२८।। तदनन्तर वे दोनों अयोध्या आकर वहाँ के समुद्र सेठकी धारिणी नामक स्त्रीके उदरसे नेत्रोंको आनन्द देनेवाले पुत्र हुए ॥१२६॥ पूर्णभद्र और काश्चनभद्र उनके नाम थे। ये दोनों भाई सुखसे समय व्यतीत करते थे। तदनन्तर पुनः श्रावक धर्म धारणकर उसके प्रभावसे सौधर्म स्वर्गमें देव हुए ॥१३०॥ अबकी बार वे दोनों, स्वर्गसे च्युत हो अयोध्या नगरीके राजा हेमनाभ और उनकी रानी अमरावतीके इस संसार में मधु, कैटभ नामसे प्रसिद्ध पुत्र हुए। ये दोनों भाई अजेय, सुन्दर तथा यमराजके समान विभ्रमको धारण करनेवाले थे ॥१३१-१३२।। गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जिस प्रकार विद्वान् लोग अपनी बुद्धिको अपने आधीन कर लेते हैं उसी प्रकार इन दोनोंने सामन्तोंसे भरी हुई इस पृथिवीको आक्रमण कर अपने आधीन कर लिया था ॥१३३।। किन्तु एक भीम नामका महाबलवान् राजा उनकी आज्ञा नहीं मानता था। जिस १. भद्रं म० । २. धर्माद्भमतः म० । ४३-३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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