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336 Padmapurana O Dev, let these wicked sons of mine live, release your anger. We are your obedient servants, along with all our relatives. ||10|| What anger can there be for the righteous? What you are saying, we are compassionate towards all, and for us, friends, enemies, brothers, relatives, etc., are all the same. ||110|| Then, the Yaksha, whose eyes were extremely red, spoke in a very deep voice, saying, "This act of the Guru Maharaj should not be spoken of in the midst of the people." ||111|| For those who see the righteous and feel disgust towards them, they quickly meet with misfortune. Wicked people do not see their own wickedness and blame the righteous. ||112|| Just as a person looking at himself in a mirror, whatever face he makes, he surely sees the same. ||113|| Similarly, a person who is eager to go in front of the righteous, to stand up, etc., gets the same fruit as the feeling he has. ||114|| He who laughs at the Muni, gets weeping in return. He who speaks harsh words to them, gets conflict in return. He who kills the Muni, gets death in return. He who harbors hatred towards them, gets sin in return. ||115|| Thus, by doing such blameworthy acts towards the righteous, the doer of such acts gets the same fruit. ||116|| O Vipra, your sons are driven by their own accumulated sins and their own actions, and they have been struck down by me, not by the righteous Maharaj. ||117|| These sons of yours, who are burning with pride in the Vedas, are very harsh, they practice blameworthy actions, and they are violent towards the restrained righteous, let them die, what harm is there in that? ||118|| The Brahmin, with folded hands and head bowed, began to appease both the fierce, angry, and fearsome Yaksha and the Muni Maharaj. ||119|| The one who had raised his arm, who was shouting loudly, who was blaming himself and his sons, and who was beating his chest, the Vipra was in great distress. ||120|| 1. Kutilau Shri. Ti. | 2. Shatrubhayankara. | 3. Viprakirna: Pidita: Shri. Ti. |
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________________ ३३६ पद्मपुराणे जीवतां देव दुःपुत्रावेतौ नः कोपमुत्सृज । सम्प्रेष्यबान्धवा नाथ वयमाज्ञाकरास्तव ॥१०॥ संयतो वक्ति का कोपः साधूनां यद्भवीष्यदः। वयं सर्वस्य सदयाः सममित्रारिबान्धवाः ।।११०॥ प्राह यक्षोऽतिरक्ताक्षो बृहद्गम्भीरनिस्वनः । माऽभ्याख्यानं गुरोरस्य जनमध्ये प्रदातकम् ।।१११॥ साधून्वीच्य जुगुप्सन्ते सद्योऽनर्थ प्रयान्ति ते । न पश्यन्त्यात्मनो दौष्टय दोषं कुर्वन्ति साधुषु ॥११२॥ यथाऽऽदर्शतले कश्चिदात्मानमवलोकयन् । यादृशं कुरुते वक्त्रं तादृशं पश्यति ध्रुवम् ।।११३॥ तद्वत्साधु समालोक्य प्रस्थानादिक्रियोद्यतः । यादृशं कुरुते भावं तादृशं लभते फलम् ॥११४।। प्ररोदनं प्रहासेन कलहं परुषोक्तितः। वधेन मरणं प्रोक्तं विद्वेषेण च पातकम् ॥११५।। इति साधोर्नियुक्तेन परिनिन्द्येन वस्तुना । फलेन तादृशेनैव का योगमुपाश्नुते ।।११६।। एतौ स्वोपचितैर्दोषैः प्रेर्यमाणौ स्वकर्मभिः । तव पुत्रौ मया विप्र स्तम्भिती न हि साधुना ॥११७॥ वेदाभिमान निर्दग्धावेतौ 'छावनीपकौ । म्रियेतां धिस्क्रियाचारौ संयतस्यातितायिनौ ।।११८।। इति जल्पन्तमत्युग्रं यक्ष प्रतिघभीषणम् | प्रसादयति साधुं च विप्रः प्राञ्जलिमस्तकः ॥११॥ उर्वबाहुः परिक्रोशन्निन्दयन्ताडयन्नुरः । सममग्निलया विप्रो 'विप्रकीर्णात्मकोऽभवत् ॥१२०॥ मीठे वचन कहकर उनकी सेवा करने लगे ॥१०८॥ उन्होंने कहा कि हे देव ! ये मेरे दुष्ट पुत्र जीवित रहें, क्रोध छोड़िए, हे नाथ ! हम सब भाई-बान्धवों सहित आपके आज्ञाकारी हैं ॥१०६।। ___ इसके उत्तरमें मुनिराजने कहा कि मुनियों को क्या क्रोध है ? जो तुम यह कह रहे हो, हम तो सबके ऊपर दयासहित हैं तथा मित्र शत्रु भाई बान्धव आदि सब हमारे लिए समान हैं ॥११०।। तदनन्तर जिसके नेत्र अत्यन्त लाल थे ऐसा यक्ष अत्यधिक गम्भीर स्वरमें बोला कि यह कार्य इन गुरु महाराजका है ऐसा जनसमूहके बीच नहीं कहना चाहिए ।।११।। क्योंकि जो मनुष्य साधुओंको देखकर उनके प्रति घृणा करते हैं वे शीघ्र ही अनर्थको प्राप्त होते हैं। दुष्ट मनुष्य अपनी दुष्टता तो देखते नहीं और साधुओंपर दोष लगाते हैं ॥११२॥ जिस प्रकार दर्पणमें अपने आपको देखता हुआ कोई मनुष्य मुखको जैसा करता है उसे अवश्य ही वैसा देखता है ॥११३।। उसी प्रकार साधुको देखकर सामने जाना, खड़े होना आदि क्रियाओंके करनेमें उद्यत मनुष्य जैसा भाव करता है वैसा ही फल पाता है ॥११४॥ जो मुनिकी हँसी करता है वह उसके बदले रोना प्राप्त करता है । जो उनके प्रति कठोर शब्द कहता है वह उसके बदले कलह प्राप्त करता है, जो मुनिको मारता है वह उसके बदले मरणको प्राप्त होता है जो उनके प्रति विद्वेष करता है वह उसके बदले पाप प्राप्त करता है ।।११५॥ इस प्रकार साधुके विषयमें किये हुए निन्दनीय कार्यसे उसका करनेवाला वैसे ही कार्यके साथ समागम प्राप्त करता है ॥११६॥ हे विप्र! तेरे ये पुत्र अपने ही द्वारा संचित दोष और अपने ही द्वारा कृत कर्मोंसे प्रेरित होते हुए मेरे द्वारा कीले गये हैं साधु महाराजके द्वारा नहीं ॥११७॥ जो वेदके अभिमानसे जल रहे हैं, अत्यन्त कठिन हैं, निन्दनीय क्रियाका आचरण करनेवाले हैं तथा संयमी साधुकी हिंसा करनेवाले है ऐसे तेरे ये पुत्र मृत्युको प्राप्त हों इसमें क्या हानि है ? ॥११८॥ हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाये हुए ब्राह्मण, इस प्रकार कहते हुए, तीव्र, क्रोध युक्त तथा शत्रु भयदायी यक्ष और मुनिराज-दोनोंको प्रसन्न करने लगा ॥११६॥ जिसने अपनी भुजा ऊपर उठाकर रक्खी थी, जो अत्यधिक चिल्लाता था, अपनी तथा अपने पुत्रों की निन्दा करता था, और अपनी छाती पीट रहा था ऐसा विप्र अग्निलाके साथ अत्यन्त पीड़ित हो रहा था ॥१२०॥ १. कुटिलौ श्री. टि० । २. शत्रुभयंकरम् । ३. विप्रकीर्णः पीडितः श्री० टि० । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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