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________________ ३३८ पद्मपुराणे वीरसेनेन लेखश्च प्रेषितस्तस्य भूपतेः । उद्वासितानि धामानि पृथिव्यां भीमवह्निना ॥१३५॥ ततो मधु क्षणं क्रुद्धो भीमकस्योपरि द्रुतम् । ययौ सर्वबलौघेन युक्तो योधैः समन्ततः ॥१३६॥ क्रमान्मार्गवशात्प्राप्तो न्यग्रोधनगरं च तत् । वीरसेनो नृपो यत्र प्रीतियुक्तो विवेश च ॥१३७॥ चन्द्रामा चन्द्रकान्तास्या वीरसेनस्य भामिनी । देवी निरीक्षिता तेन मधुना जगदिन्दुना ॥१३॥ अनया सह संवासो वरं विन्ध्यवनान्तरे । चन्द्राभया विना भूतं न राज्यं सार्वभूमिकम् ॥१३॥ इति सञ्चिन्तयन् राजा भौमं निर्जित्य संयुगे । आस्थापयद्वशे शवनन्यांश्च तत्कृताशयः॥१४॥ अयोध्यां पुनरागत्य सपत्नीकानराधिपान् । आहूय विपुलैनिर्विसर्जयति मानितान् ॥१४॥ आहूतो वीरसेनोऽपि सह परन्या ययौ द्रुतम् । अयोध्यावहिरुद्याने मध्येऽस्थारसरयूतटे ।।१४२॥ देव्या सह समाहूतः प्रविष्टो भवनं मधोः । उदारदानसन्मानो वीरसेनो विसर्जितः ॥१३॥ अद्यापि मन्यते नेयमिति रुद्धा मनोहरा । चन्द्राभा नरचन्द्रण प्रेषितान्तःपुरं ततः ॥१४॥ महादेव्यभिषेकेण प्रापिता चाभिषेचनम् । आरूढा सर्वदेवीनामुपरिस्थितमास्पदम् ॥१४५॥ श्रियेव स तया साकं निमग्नः सुखसागरे । स्वं सुरेन्द्रसमं मेने भोगान्धीकृतमानसः ॥१४६॥ प्रकार चमरेन्द्र नन्दन वनको पाकर प्रफुल्लित होता है उसी प्रकार वह पहाड़ी दुर्गका आश्रय कर प्रफुल्लित था ॥१३४॥ राजा मधुके एक भक्त सामन्त वीरसेनने उसके पास इस आशयका पत्र भी भेजा कि हे नाथ ! इधर भीमरूपी अग्निने पृथिवीके समस्त घर उजाड़ कर दिये हैं ॥१३५॥ तदनन्तर उसी क्षण क्रोधको प्राप्त हुआ राजा मधु, अपनी सब सेनाओंके समूह तथा योधाओंसे परिवृत हो राजा भीमके प्रति चल पड़ा ॥१३६।। क्रम-क्रमसे चलता हुआ वह मार्गवश उस न्यग्रोध नगरमें पहुँचा जहाँ कि उसका भक्त वीरसेन रहता था। राजा मधुने बड़े प्रेमके साथ उसमें प्रवेश किया ॥१३७।। वहाँ जाकर जगत्के चन्द्र स्वरूप राजा मधुने वीरसेनकी चन्द्राभा नामकी चन्द्रमुखी भार्या देखी। उसे देखकर वह विचार करने लगा कि इसके साथ विन्ध्याचलके वनमें निवास करना अच्छा है। इस चन्द्राभाके विना मेरा राज्य सार्वभूमिक नहीं: है-अपूर्ण है ।।१३८-१३६॥ ऐसा विचार करता हुआ राजा उस समय आगे चला गया और युद्ध में भीमको जीतकर अन्य शत्रुओंको भी उसने वश किया । परतु यह सब करते हुए भी उसका मन उसी चन्द्राभामें लगा रहा ॥१४०॥ फलस्वरूप उसने अयोध्या आकर राजाओंको अपनी-अपनी पत्नियोंके सहित बुलाया और उन्हें बहुत भारी भेट देकर सम्मानके साथ विदा कर दिया ॥१४१॥ राजा वीरसेनको भी बुलाया सो वह अपनी पत्नीके साथ शीघ्र ही गया और अयोध्याके बाहर बगीचेमें सरयू नदीके तटपर ठहर गया ॥१४२।। तदनन्तर सन्मानके साथ बलाये जानेपर उसने अपनी रानीके साथ मधुके भवनमें प्रवेश किया। कुछ समय बाद उसने विशेष भेंट के द्वारा सन्मान कर वीरसेनको तो विदा कर दिया और चन्द्राभाको अपने अन्तःपुरमें भेज दिया परन्तु भोला वीरसेन अब भी यह नहीं जान पाया कि हमारी सुन्दरी प्रिया यहाँ रोक ली गई है ॥१४३-१४४॥ तदनन्तर महादेवीके अभिषेक द्वारा, अभिषेकको प्राप्त हुई चन्द्रामा सब देवियोंके ऊपर स्थानको प्राप्त हुई । भावार्थ-सब देवियोंमें प्रधान देवी बन गई ।।१४।। भोगोंसे जिसका मन अन्धा हो रहा था ऐसा राजा मधु, लक्ष्मीके समान उस चन्द्राभाके साथ सुखरूपी सागरमें निमग्न होता हुआ अपने आपको इन्द्रके समान मानने लगा ॥१४६॥ १. उदारदार म०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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