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________________ नवोत्तरशतं पर्व ३३३ उद्घाटनघटीयन्त्रसरशेऽस्मिन् भवात्मनि । 'उपर्यधरतां यान्ति जीवाः कर्मवशं गताः ॥६६॥ इति ज्ञात्वा भवावस्थां नितान्तं वत्स निन्दिताम् । अधुना मूकतां मुञ्च कुरु वाचां क्रियां सतीम् ॥७०॥ इत्युक्तः परमं हृष्ट उत्थाय विगतज्वरः । उद्भूतधनरोमाञ्चः प्रोत्फुल्लनयनाननः ॥७॥ गृहीत इव भूतेन परिभ्रम्य प्रदक्षिणाम् । निपपातोत्तमाङ्गेन छिन्नमूलतयथा ॥७२॥ उवाच विस्मितश्वोच्चस्त्वं सर्वज्ञपराक्रमः । इहस्थः सर्वलोकस्य सकलां पश्यसि स्थितिम् ॥७३।। संसारसागरे घोरे कष्टमेवं निमजतः । सत्वानुकम्पया बोधिस्त्वया मे नाथ दर्शिता ॥७॥ मनोगतं मम ज्ञातं भवता दिव्यबुद्धिना । इत्युक्त्वा जगृहे दीक्षा सानान् संत्यज्य बान्धवान् ॥७५॥ तस्य प्रामरकस्यैतच्छुत्वोपाख्यानमीरशम् । संवृत्ता बहवो लोके श्रमणाः श्रावकास्तथा ॥७६॥ गत्वा च ते रती रष्टे सर्वलोकेन तद्गृहे । ततः कलकलो जातो विस्मयश्च समन्ततः ॥७॥ अथोपहसितौ राजस्तौ जनेन द्विजातिको । इमौ तौ पशुमांसादौ जम्बुकौ द्विजतां गतौ ॥८॥ एताभ्यां ब्रह्मतावादे विमूढाभ्यां सुखार्थिनी । प्रजेयं मुषिता सर्वा सक्ताभ्यां पशुहिंसने ॥६॥ अमी तपोधनाः शुद्धाः श्रमणा ब्राह्मणाधिकाः । ब्राह्मणा इति विख्याता हिंसामुक्तिवतश्रिताः ॥८॥ महावतशिखाटोपाः हान्तियज्ञोपवीतिनः । ध्यानाग्निहोत्रिणः शान्ता मुक्तिसाधनतत्पराः ॥८१॥ सर्वारम्भप्रवृत्ता ये नित्यमब्रह्मचारिणः। द्विजाः स्म इति भाषन्ते क्रियया न पुनर्द्विजाः ॥२॥ हो जाता है । माता पत्नी हो जाती है और पत्नी माता बन जाती है ॥६७-६८॥ यह संसार अरहटके घटीयन्त्रके समान है इसमें जीव कर्मके वशीभत हो ऊपर-नीची अवस्थाको प्राप्त होता रहता है ॥६६॥ इसलिए हे वत्स ! संसार दशाको अत्यन्त निन्दित जानकर इस समय गूंगापन . छोड़ और वचनोंको उत्तम क्रिया कर अर्थात् प्रशस्त वचन बोल ॥७०॥ मुनिराजके इतना कहते ही वह अत्यन्त हर्षित होता हुआ उठा, वह ऐसा प्रसन्न हुआ मानो उसका ज्वर उतर गया हो, उसके शरीरमें सघन रोमाञ्च निकल आये, तथा उसके नेत्र और मुख हर्षसे फूल उठे ॥७१।। भूतसे आक्रान्त हुएके समान उसने मुनिकी प्रदक्षिणाएँ दीं। तदनन्तर कटे वृक्षके समान मस्तकके बल उनके चरणों में गिर पड़ा ॥७२॥ उसने आश्चर्य चकित हो जोरसे कहा कि हे भगवन् , आप सर्वज्ञ हैं। यहाँ बैठे-बैठे ही आप समस्त लोककी सम्पूर्ण स्थितिको देखते रहते हैं ॥७३॥ मैं इस भयंकर संसार-सागरमें डब रहा था सो आपने प्राण्यनुकम्पासे हे नाथ ! मेरे लिए रत्नत्रय रूप बोधिका दर्शन कराया है ।।७४|| आप दिव्यबुद्धि हैं अतः आपने | मनोगत भाव जान लिया। इस प्रकार कहकर उस प्रामरकके जीव ब्राह्मणने रोते हए भाई. बान्धवोंको छोड़कर दीक्षा धारण कर ली ॥७॥ प्रामरकका यह ऐसा व्याख्यान सुन बहुतसे लोग मुनि तथा श्रावक हो गये ॥७६॥ सब लोगोंने उसके घर जाकर पूर्वोक्त शृगालोंके शरीरसे बनी मशकें देखीं जिससे सब ओर कलकल तथा आश्चर्य छा गया ॥७७॥ अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! लोगोंने यह कहकर उन ब्राह्मणोंकी बहुत हँसी की कि ये वे ही पशुओंका मांस खानेवाले शृगाल ब्राह्मण पर्यायको प्राप्त हुए हैं ॥७८॥ 'सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है' इस प्रकारके ब्रह्माद्वैतवादमें मूढ एवं पशुओंकी हिंसामें आसक्त रहनेवाले इन दोनों ब्राह्मणोंने सुखकी इच्छुक समस्त प्रजाको लूट डाला है ॥७॥ तपरूपी धनसे युक्त ये शुद्ध मुनि ब्राह्मणोंसे अधिक श्रेष्ठ हैं क्योंकि यथार्थमें ब्राह्मण वे ही कहलाते हैं जो अहिंसा व्रतको धारण करते हैं ॥८०॥ जो महाव्रत रूपी लम्बी चोटी धारण करते हैं, जो क्षमारूपी यज्ञोपवीतसे सहित हैं, जो ध्यानरूपी अग्निमें होम करनेवाले हैं, शान्त हैं तथा मुक्तिके सिद्ध करनेमें तत्पर हैं वे ही ब्राह्मण कहलाते हैं ॥१॥ इसके विपरीत जो सब प्रकारके आरम्भमें १. उपर्युपरितां म०। २. उद्भूतघनरोमाञ्च प्रोत्फुल्ल- म०। ३. ब्रह्मतावाद-म० । ४. ब्राह्मणोधिपाः म० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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