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________________ पटुत्तरशतं पर्व भारत्यपि न वक्तव्या दुरितादानकारिणी । सीतायाः पश्यत 'प्राप्तो दुर्वादः शब्दमात्रतः ।।२२४|| ग्रामो मण्डलिको नाम तमायातः सुदर्शनः । मुनिमुद्यानमायातं वन्दित्वा तं गता जनाः || २२५ || सुदर्शनां स्थितां तत्र स्वसारं सद्वचो ब्रुवन् । ईक्षितो वेदवस्याऽसौ सत्या श्रमणया तथा ॥ २२६ ॥ ततो ग्रामीणलोकाय सम्यग्दर्शनतत्परा । जगाद पश्यतेदृक्षं* श्रमणं बूथ सुन्दरम् ||२२७॥ या सुयोषिता साकं स्थितो रहसि वीचितः । ततः कैश्चित् प्रतीतं तन्न तु कैश्विद्विचचणैः ॥२२८॥ अनादरो मुनेर्लोकैः कृतश्चावग्रहोऽमुना । वेदवत्या मुखं " शूनं देवताया नियोगतः ॥२२६॥ "अपुण्यया मयाऽलीकं चोदितं भवतामिति । तथा प्रत्यायितो लोक इत्याद्यत्र कथा स्मृता ॥ २३०॥ एवं सभ्रातृयुगलं निन्दितं यत्तदानया । अवर्णवादमीदृतं प्राप्तेयं वितथं ततः ।। २३१|| टः सत्योऽपि दोषो न वाच्यो जिनमतश्रिता । उच्यमानोऽपि चान्येन वार्यः सर्वप्रयत्नतः ॥ २३२ ॥ वाणो लोकविद्वेष करणं शासनाश्रितम् । प्रतिपद्य चिरं दुःखं संसारमवगाहते ॥ २३३॥ सम्यग्दर्शनरवस्य गुणोऽत्यन्तमयं महान् । यद्दोषस्य कृतस्यापि प्रयत्नादुपगूहनम् ॥२३४॥ अज्ञानान्मत्सराद्वापि दोषं वितथमेव तु । प्रकाशयञ्जनोऽत्यन्तं जिनमार्गाद्बहिः स्थितः ॥ २३५॥ इति श्रुत्वा मुनीन्द्रस्य भाषितं परमाद्भुतम् । सुरासुरमनुष्यास्ते विस्मयं परमं गताः ॥ २३६ ॥ परम दुःखों का ऐसा कारण जानकर हे आत्महितके इच्छुक भव्य जनो ! किसीके साथ वैरका सम्बन्ध मत रक्खो ॥२२३॥ जिससे पापबन्ध हो ऐसा एक शब्द भी नहीं बोलना चाहिए। देखो, शब्द मात्र से सीता को कैसा अपवाद प्राप्त हुआ ? ||२२४|| इसकी कथा इस प्रकार है कि जब सीता वेदवतीकी पर्याय में थी तब एक मण्डलिक नामका ग्राम था । उस ग्राम में एक सुदर्शन नामक मुनि आये । मुनको उद्यानमें आया देख लोग उनकी वन्दनाके लिए गये | वन्दना कर जब सब लोग चले गये तब उनके पास एक सुदर्शना नामकी आर्यिका जो कि मुनिकी बहिन थी बैठी रही और - मुनि उसे सद्वचन कहते रहे । वेदवतीने उस उत्तम साध्वी- आर्यिका के साथ मुनिको देखा । तदनन्तर अपने आपको सम्यग्दृष्टि बताने में तत्पर वेदवतीने गाँवके लोगोंसे कहा कि हाँ, आप लोग ऐसे साधुके अवश्य दर्शन करो और उन्हें अच्छा बतलाओ । मैंने उन साधुको एकान्त में एक सुन्दर स्त्री के साथ बैठा देखा है । वेदवतीकी यह बात किन्होंने मानी और जो विवेकी ऐसे किन्हीं लोगोंने नहीं मानी ॥२२५-२२८|| इस प्रकरणसे लोगोंने मुनिका अनादर किया । तथा मुनिने यह प्रतिज्ञा ली कि जब तक यह अपवाद दूर न होगा तबतक आहार के लिए नहीं निकलूँगा । इस अपवाद से वेदवतीका मुख फूल गया तब उसने नगरदेवता की प्रेरणा पा मुनिसे कहा कि मुझ पापिनीने आपके विषय में मूठ कहा है। इस तरह मुनिसे क्षमा कराकर उसने अन्य लोगों को भी विश्वास दिलाया। इस प्रकार वेदवतीकी पर्यायमें सीताने उन बहिन भाईके युगलकी झूठी निन्दा की थी इसलिए इस पर्याय में यह इस प्रकारके मिथ्या अपवादको प्राप्त हुई है ।। २२६ - २३१|| यदि यथार्थ दोष भी देखा हो तो जिनमतके अवलम्बीको नहीं कहना चाहिए और कोई दूसरा कहता भी हो तो उसे सब प्रकारसे रोकना चाहिए ॥ २३२॥ फिर लोक में विद्वेष फैलानेवाले शासन सम्बन्धी दोषको जो कहता है वह दुःख पाकर चिरकाल तक संसार में भटकता रहता है || २३३ ॥ किये हुए दोषको भी प्रयत्नपूर्वक छिपाना यह सम्यग्दर्शनरूपी रत्नका बड़ा भारी गुण है || २३४|| अज्ञान अथवा मत्सर भावसे भी जो किसीके मिथ्या दोष को प्रकाशित करता है वह मनुष्य जिनमार्गसे बिलकुल ही बाहर स्थित है || २३५ || इस प्रकार सकलभूषण केवलीका अत्यधिक आश्चर्यसे भरा हुआ उपदेश सुनकर समस्त सुर असुर और ४. तेशं म० । ५. सूनं म० । १. प्रासा म० । २. मायान्तं म० । ३. श्रवण्या म० । ६. पुण्यामा म० । ७. भगवानिति म० । ३१५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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