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________________ ३१४ पद्मपुराणे अकूपारं समुत्तीर्य धरणीचारिणा सता। हिसितो हिंसकः पूर्व लचमणेन दशाननः ॥२०॥ राक्षसीश्रीक्षपाचन्द्रं तं निहत्य दशाननम् । सौमित्रिणा समाक्रान्ता पृथिवीयं ससागरा ॥२१॥ क्वासौ तथाविधः शूरः क्व चेयं गतिरीदशी । माहात्म्यं कर्मणामेतदसम्भाव्यमवाप्यते ॥२१॥ वध्यघातकयोरेवं जायते व्यत्ययः पुनः । संसारभावसक्तानां जन्तूनां स्थितिरीशी ॥२१२॥ क्व नाके परमा भोगाः क्व दुःखं नरके पुनः । विपरीतमहोऽत्यन्तं कर्मणां दुर्विचेष्टितम् ॥२१३॥ परमानमहाकूटं याशं विषदूषितम् । तपस्तादृशमेवोग्रनिदानकृतनन्दनम् ॥२१४|| इयं शाकं दुमं छित्वा कोद्रवाणां वृतिः कृता । अमृतवसेकेन पोषितो विषपादपः ।.२१५॥ सूत्रार्थे चूर्णिता सेयं परमा रत्नसंहतिः । गोशीर्ष चन्दनं दग्धमङ्गारहितचेतसा ॥२१६।। जीवलोकेऽबला नाम सर्वदोषमहाखनिः । किं नाम न कृते तस्याः क्रियते कर्म कुत्सितम् ॥२१७॥ प्रत्यावृत्य कृतं कर्म फलमर्पयति ध्रवम् । तस्कत्त मन्यथा केन शक्यते भवनत्रये ॥२१॥ कृत्वापि सङ्गति धर्म यगजन्तीदशों गतिम् । उच्यतामितरेषां किं तत्र निर्धर्मचेतसाम् ॥२१॥ श्रामण्यसङ्गतस्यापि साध्यमत्सरसेविनः । कृत्वाऽप्युप्रतपो नास्ति शिवं संज्वलनस्पृशः ॥२२०॥ न शमोन तपो यस्य मिथ्यादृष्टेनं संयमः। संसारोत्तरणे तस्य क उपायो दुरात्मनः ॥२२१॥ हियन्ते वायुना यत्र गजेन्द्रा मदशालिनः । पूर्वमेव हृतास्तत्र शशकाः स्थलवर्तिनः ॥२२२॥ एवं परमदुःखानां ज्ञात्वा कारणमीदशम् । मा काष्टं वैरसम्बन्धं जनाः स्वहितकाक्षिणः ॥२२३॥ लक्ष्मणने भूमिगोचरी होनेपर भी समुद्रको पारकर पूर्व पर्यायमें अपना घात करनेवाले रावणको मारा है ॥२०६।। राक्षसोंकी लक्ष्मीरूपी रात्रिको सुशोभित करनेके लिए चन्द्रमा स्वरूप रावणको . .मारकर लक्ष्मणने इस सागर सहित समस्त पृथिवीपर अपना अधिकार किया है ।।२१०॥ सकल भूषण केवली कहते हैं कि कहाँ तो वैसा शूर वीर और कहाँ ऐसी गति ? यह कर्मोंका ही माहात्म्य है कि असम्भव वस्तु भी प्राप्त हो जाती है ॥२११।। इस प्रकार वध्य और घातक जीवोंमें पुन:पुनः बदली होती रहती है अर्थात् पहली पर्यायमें जो वध्य होता है वह आगामी पर्यायमें उसका घातक होता है और पहली पर्यायमें जो घातक होता है वह आगामी पर्यायमें वध्य होता है । संसारी जीवोंकी ऐसी ही स्थिति है ॥२१२॥ कहाँ तो स्वर्गमें उत्तम भोग और कहाँ नरकमें तीव्र दुःख ? अहो ! कोंकी बड़ी विपरीत चेष्टा है ॥२१३।। जिस प्रकार परम स्वादिष्ट अन्नकी महाराशि विषसे दूषित हो जाती है, उसी प्रकार परम उत्कृष्ट तप भी निदानसे दूषित हो जाता है ।।२१४॥ निदान अर्थात् भोगाकांक्षाके लिए तपको दूषित करना ऐसा है जैसा कि कल्पवृक्ष काटकर कोदोंके खेतकी बाड़ी लगाना अथवा अमृत सींचकर विषवृक्षको बढ़ाना अथवा सूतके लिए उत्तम मणियों की मालाका चूर्ण करना अथवा अंगारके लिए गोशीर्ष चन्दनका जलाना ॥२१५-२१६॥ संसारमें स्त्री समस्त दोषोंकी महाखान है । ऐसा कौन निन्दित कार्य है जो उसके लिए नहीं किया जाता हो ? ॥२१७।। किया हुआ कर्म लौटकर अवश्य फल देता है उसे भुवनत्रयमें अन्यथा करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥२१८।। जब धर्म धारण करनेवाले मनुष्य भी इस गतिको प्राप्त होते हैं तब धर्महीन मनुष्यों की बात ही क्या है ? ॥२१६।। जो मुनिपद धारण करके भी साध्यपदार्थों के विषयमें मत्सर भाव रखते हैं ऐसे संज्वलन कषायके धारक मुनियोंको उग्र तपश्चरण करने पर भी शिव अर्थात् मोक्ष अथवा वास्तविक कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती ॥२२०।। जिस मिथ्यादृष्टिके न शम अर्थात् शान्ति है, न तप है और न संयम है उस दुरात्मा के पास संसार-सागरसे उतरनेका उपाय क्या है ? ॥२२१।। जहाँ वायुके द्वारा मदोन्मत्त हाथी हरण किये जाते हैं वहाँ स्थल में रहनेवाले खरगोश तो पहले ही हरे जाते हैं ।।२२२।। इस प्रकार १. समो म०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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