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________________ पडुत्तरशतं पर्व ३१३ अतपञ्च तपस्तीवं यथाविधि महाशयः । संवत्सरसहस्राणि बहुनि सुमहामनाः ॥१४॥ नानालब्धिसमेतोऽपि यो न गर्वमुपागतः । संयोगजेषु भावेषु तत्याज ममतां च यः ॥११५॥ विकषायसितध्यानसिद्धः स्यात्स महामुनिः । पर्याप्तं केवलं नायुरतः सर्वार्थसिद्धिमैत् ॥१६६॥ त्रयस्त्रिंशस्समुद्रायुस्तत्र भुक्त्वा महासुखम् । वालिनाम्नाजनिष्टासौ प्रतापी खेचराधिपः ॥१९७॥ द्रव्यदर्शनराज्यं यः प्राप किष्किन्धभूधरे । भ्राता यस्यैव सुग्रीवो महागुणसमन्वितः ॥१६॥ विरोधमतिरूढोऽपि लङ्काधिपतिना समम् । विन्यस्यात्र श्रियं जीवदयार्थ दाक्षितोऽभवत् ॥१६॥ दशाननेन गर्वेण सामर्थ्येन समुद्धृतः । पादाङ्गटेन कैलासस्त्याजितो येन साधुना ॥२०॥ निर्दह्य स भवारण्यं परमध्यानतेजसा । त्रिलोकाग्रं समारूढः प्राप्तो जीवनिजस्थितिम् ॥२०१॥ परस्परमनेकत्र भवेऽन्योन्यवधः कृतः। श्रीकान्तवसुदत्ताभ्यां महावैरानुबन्धतः ॥२०२॥ पूर्व वेदवतीकाले सम्बन्धीतिना परम् । रावणेन हृता सीता तथा कर्मानुभावतः ॥२०३॥ श्रीभूतिवेदविद्विप्रः सम्यग्दृष्टिरनुत्तमः । हिंसितो वेदवत्यर्थे शम्भुना कामिना यतः ।।२०४॥ श्रीभूतिः स्वर्गमारुह्य प्रतिष्ठनगरे च्युतः । भूत्वा पुनर्वसुः शोकात्सनिदानतपोऽन्वितः ॥२०५।। सनत्कुमारमारुह्य च्युत्वा दशरथात्मजः । भूबा रामानुजस्तीबस्नेहो लक्ष्मणचक्रभृत् ॥२०६॥ शम्भुपूर्व ततः शत्रुमवचीपूर्ववरतः । दशाननमयं वीरः सुमित्राजो निकाचितात् ॥२०७॥ भ्रातुर्वियोगजं दुःखं यदाऽऽसीत्सह सीतया । निमित्तमात्रमासीत्तद्दशवक्त्रस्य संक्षये ॥२०॥ पास जिन-दीक्षा धारण कर ली ।।१६।। इस प्रकार उदार अभिप्राय और विशाल हृदयको धारण करनेवाले सुप्रभ मुनिने कई हजार वर्ष तक विधिपूर्वक कठिन तपश्चरण किया ॥१६४॥ वे सुप्रभ मुनि नानाऋद्धियोंसे सहित होनेपर भी गर्वको प्राप्त नहीं हुए थे तथा संयोगजन्य भावों में उन्होंने सब ममता छोड़ दी थी ।।१६।। तदनन्तर जिन्हें कषायकी उपशम अवस्थामें होनेवाला शुक्लध्यानका प्रथम भेद प्रकट हुआ था ऐसे वे महामुनि सिद्ध अवस्थाको अवश्य प्राप्त होते परन्तु आयु अधिक नहीं थी इसलिए उसी उपशान्त दशामें मरणकर सर्वार्थसिद्धि गये ॥१६६।। वहाँ तैतीस सागर तक महासुख भोगकर वे वालिनामके प्रतापी विद्याधरोंके राजा हुए ।।१६७॥ जिन्होंने किष्किन्ध पर्वत पर विविध सामग्रीसे युक्त राज्य प्राप्त किया था, महागुणवान् सुग्रीव जिनका भाई है। लंकाधिपति रावणके साथ विरोध होने पर भी जो इस सुग्रीवके ऊपर राज्यलक्ष्मी छोड़ जीवदयाके अर्थ दीक्षित हो गये थे, तथा गर्व वश रावणके द्वारा उठाये हुए कैलास को जिन्होंने साधु अवस्थामें अपनी सामर्थ्यसे केवल पैरका अंगूठा दबा कर छुड़वा दिया था। वही वालि मुनि उत्कृष्ट ध्यानके तेजसे संसार रूपी वनको भस्म कर तीन लोकके अग्रभाग पर आरूढ़ हो आत्माके निज स्वरूपमें स्थितिको प्राप्त हुए हैं ॥१८-२०१॥ श्रीकान्त और वसुदत्तने महावरके कारण अनेक भवोंमें परस्पर एक दूसरेका वध किया है ।।२०२।। पहले वेदवतीकी पर्यायमें गवणका जीव सीताके साथ सम्बन्ध करना चाहता था उसी संस्कारसे उसने रावणकी पर्यायमें सीताका हरण किया ॥२०३॥ जब रावण शम्भु था तब उसने कामी होकर वेदवतीकी प्राप्तिके लिए वेदोंके जाननेवाले, उत्तम सम्यग्दृष्टि श्रीभूति ब्राह्मण की हत्या की थी ॥२०४।। वह श्रीभूति स्वर्ग गया वहाँसे च्युत होकर प्रतिष्ठ नगरमें पुनवसु विद्याधर हुआ सो शोकवश निदान सहित तपकर सानत्कुमार स्वर्गमें उत्पन्न हुआ। तदनन्तर वहाँ से च्युत हो दशरथका पुत्र तथा रामका छोटा भाई परम स्नेही लक्ष्मण नामका चक्रधर हुआ ॥२०५-२०६।। इस वीर लक्ष्मणने, नहीं छूटनेवाले पूर्व वैरके कारण ही शम्भुका जीव जो दशानन हुआ था उसे मारा है ॥२०७॥ यतश्च पूर्वभवमें सोताके जीवको रावणके जीवके द्वारा भाईके वियोगका दुःख उठाना पड़ा था इसलिए सीता रावणके क्षयमें निमित्त हुई है ॥२०॥ १. विलोकाग्रं म । २. दशाननभयं म० । ४०-३ Jain Education International www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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