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________________ पद्मपुराणे जाता च बलदेवस्य पत्नी विनयशालिनी । शीलकोशी सुरेशस्य शचीव सुविचेष्टिता ॥१७॥ योऽसौ गुणवतीभ्राता गुणवानभवत्तदा । सोऽयं भामण्डलो जातः सुहृल्लाङ्गललचमणः ॥१८॥ यत्रामृतवतीदेवी ब्रह्मलोकनिवासिनी । च्यवतेऽद्येति तत्रैव काले कुण्डलमण्डितः ॥१८॥ विदेहायास्तयोर्ग समुपसः समागमः। तभ्रातृयुगलं जातमनघं सुमनोहरम् ॥१२॥ योऽसौ यज्ञवलिर्विप्रः स त्वं जातो विभीषणः । असौ वृषभकेतुस्तु सुग्रीवोऽयं कपिध्वजः ॥१८३॥ त एते पूर्वया प्रीत्या तथा पुण्यानुभावतः । यूयं रक्तात्मका जाता रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥१८॥ पूर्वमाजननं बालेयंदपृच्छद् विभीषणः । केवली च समाचख्यौ शृणु ते श्रेणिकाधुना ॥१८५॥ रत्यरत्यादिदुःखौघे संसारे चतुरन्तके | वृन्दारण्यस्थले जन्तुरेकः कृष्णमृगोऽभवत् ॥१८६॥ साधुस्वाध्यायनिःस्वानं श्रुत्वायुर्विलये मृगः । ऐरावते दितिस्थाने प्राप नृत्वमनिन्दितम् ॥१८॥ सम्यग्दृष्टिः पिताऽस्यासीद् विहीताख्यः सुचेष्टितः । माता शिवमतिः पुत्रो मेघदत्तस्तयोरयम् ॥10॥ अणुवतधरः सोऽयं जिनपूजासमुद्यतः । वन्दारुः कृतसत्कालः कल्पमैशानमाश्रयत् ॥१८॥ व्युत्वा जम्बूमति द्वीपे विदेहे पूर्वभूमिके । पुरोऽस्ति विजयावत्याः समीपे सततोत्सवः ॥१६॥ सुग्रामः पत्तनाकारो नामतो मत्तकोकिलः । कान्तशोकः प्रभुस्तत्र तस्य रत्नाकिनी प्रिया ॥११॥ तयोः सुप्रभनामाऽभूत्तनयश्चारुदर्शनः । बहुबन्धुजनाकीर्णः शुभैकचरितप्रियः ॥१२॥ संसारे दुर्लभां प्राप्य बोधिं जिनमतानुगाम् । अग्रहीत् संयम पावे संयतस्य महामुनेः ॥१३॥ पुरोहितकी बेदवती पुत्री हुई थी वही अब क्रमसे रा की बेदवती पत्री हई थी वही अब क्रमसे राजा जनक की सीता नामकी पत्री हई है ॥१७८।। यह सीता बलदेव-रामकी विनयवती पत्नी है, शीलका खजाना है तथा इन्द्रकी इन्द्राणीके समान सुन्दर चेष्टाओंको धारण करने वाली है ।।१७।। उस समय जो गुणवतीका भाई गुणवान था वही यह रामका परममित्र भामण्डल हुआ है ॥१८०॥ ब्रह्मलोकमें निवास करने वाली गुणवतीका जीव अमृतमती देवी जिस समय च्युत हुई थी उसी समय कुण्डलमण्डित भी च्युत हुआ था सो इन दोनोंको जनककी रानी विदेहाके गर्भमें समागम हुआ। यह बहिन-भाईका जोड़ा अत्यन्त मनोहर तथा निर्दोष था ॥१८१-१८२॥ जो पहले यज्ञवलि ब्राह्मग था वह तु विभीषण हआ है और जो वृषभकेत था वह यह वानरकी ध्वजासे युक्त सुग्रीव हुआ है॥१८३॥ इस प्रकार तुम सभी पूर्व प्रीतिसे तथा पुण्यके प्रभावसे पुण्यकर्मा रामके साथ प्रीति रखने वाले हुए हो ॥१८४॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इसके बाद विभीषणने सकलभूषण केवलीसे बालिके पूर्वभव पूछे सो केवलीने जो निरूपण किया उसे मैं कहता हूँ सो सुन ॥१८॥ राग, द्वेष आदि दुःखोंके समूहसे भरे हुए इस चतुर्गति रूप संसारमें वृन्दावनके बीच एक कृष्णमृग रहता था॥१८६॥ आयुके अन्तके समय वह मृग मुनियोंके स्वाध्याय का शब्द सुन ऐरावत क्षेत्रके दितिनामा नगरमें उत्तम मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुआ ॥१८७॥ वहाँ सम्यग्दृष्टि तथा उत्तम चेष्टाओंको धारण करनेवाला विहीत नामका पुरुष इसका पिता था और शिवमति इसकी माता थी। उन दोनोंके यह मेघदत्त नामका पुत्र हुआ था ॥१८॥ मेघदत्त अणुव्रतका धारी था, जिनेन्द्रदेवकी पूजा करनेमें सदा उद्यत रहता था और जिन-चैत्यालयोंकी वन्दना करने वाला था। आयुके अन्त में समाधिमरण कर वह ऐशान स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ॥१८॥ जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें विजयावती नगरीके समीप एक मत्तकोकिल नामका उत्तम ग्राम है जिसमें निरन्तर उत्सव होता रहता है तथा जो नगरके समान सुन्दर है । उस ग्रामका स्वामी कान्तशोक था तथा रत्नाकिनी उसकी स्त्री थी। मेघदत्तका जीव ऐशान स्वगसे च्युत होकर उन्हीं दोनोंके सुप्रभ नामका सुन्दर पुत्र हुआ। यह सुप्रभ अनेक बन्धुजनोंसे सहित था तथा शुभ आचार ही उसे प्रिय था ॥१६०-१९२।। उसने संसार में दुर्लभ जिनमतानुगामी रत्नत्रयको पाकर संयतनामा महामुनिके Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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